रात्रि में योगी, भोगी और रोगी ही जागते हैं

रात्रि में योगी, भोगी और रोगी ही जागते हैं

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)

रात में तीन लोग जागते हैं - योगी, भोगी और रोगी। योगी साधना के लिए जागता है, भोगी वासना के लिए जागता है और रोगी वेदना के कारण जागता है। योगी साधना से सिद्ध बन जाता है, भोगी वासना से गिद्ध बन जाता है और रोगी वेदना से बुद्ध बन जाता है। अरे मित्रों! वासना को छोड़ो, साधना से स्वयं को जोड़ो और कभी रोग आ जाए तो समता से उसका सामना करो। उससे मुँह मत मोड़ो।

किसी भी नगर में दो चीजों का होना शर्मसार है - जुआघर और शराबघर। जुआ प्रलोभन देकर आदमी को बर्बाद करता है और शराब जीवन लेकर आदमी को बर्बाद करती है। शराब जिंदगी भर आदमी को पी-पी कर चूसती है। शराब पीने के बाद आदमी आदमी नहीं रहता। वह राक्षस हो जाता है। सरकार कहती है शराब से राजस्व बढ़ता है इसलिए हम इसे बंद नहीं कर सकते। मैं आपकी बात मानता हूँ, लेकिन आप को भी मेरी एक बात माननी होगी। राजस्व के साथ-साथ राज्य में राक्षस भी तो बढ़ते हैं।

एक गधे के सामने यदि गुटखा और शराब रख दी जाए, तो वह भी यही कहेगा कि भाई! यह मेरा भोजन नहीं है। इसे तो आदमी ही सेवन कर सकता है।

अतः भोगी और रोगी बनने की अपेक्षा योगी बनो और अपना कल्याण करो।

ओऽम् शांति सर्व शांति!!

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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