अनछना पानी पीना - हिंसक होना
अनछना पानी पीना - हिंसक होना
(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)
जल में अनेक त्रस जीव पाए जाते हैं। वे इतने सूक्ष्म होते हैं कि खुली आँखों से दिखाई नहीं देते। आधुनिक वैज्ञानिकों ने यंत्रों की सहायता से देखकर बताया है कि जल की एक बूंद में 36450 जलजीव होते हैं। जैन ग्रंथों के अनुसार उक्त जीवों की संख्या बहुत अधिक है। ऐसा कहा जाता है कि एक जल के बिंदु में इतने जीव पाए जाते हैं कि यदि वे कबूतर की तरह आकाश में उड़ें, तो पूरे जम्बू द्वीप को ढक लें। इन जीवों के बचाव के लिए पानी को मोटे वस्त्र से छानकर पीना चाहिए।
मनुस्मृति में भी कहा गया है -
दृष्टिपूतम् न्यसेत पादम् वस्त्रपूतम् पिबेत जलम्।।
ऐसा कहकर जल छानकर पीने का परामर्श दिया गया है। अनछना पानी पीने से हिंसा की संभावना तो रहती ही है, अनेक प्रकार के रोगों का भी शिकार होना पड़ता है। आजकल तो चिकित्सक भी छना पानी पीने की सलाह देते हैं। वस्त्र द्वारा पानी छानने का मुख्य उद्देश्य करुणा करना है। उसके साथ-साथ अनेक रोगों से बचाव भी हो जाता है।
अभी कुछ दिन पहले भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने एक धर्म सभा को संबोधित करते हुए इंदौर की एक घटना सुनाई और पानी छानकर पीने का महत्व बताते हुए कहा कि कुछ दिन पूर्व इंदौर के एक मोहल्ले में एक विशेष प्रकार का रोग फैला, जिसमें पूरे के पूरे परिवार ने बिस्तर पकड़ लिया। एक सीमित क्षेत्र में ही रोग के प्रभावी होने से चिकित्सक चिंतित थे। उसी समय यह भी देखा गया कि उस मोहल्ले के जैन परिवार में इस रोग का कोई लक्षण नहीं दिखा। डॉक्टर चकित थे लेकिन बाद में खोज करने पर मालूम हुआ कि उस वॉटर टैंक में, जिससे पूरे मोहल्ले में पानी वितरित होता था, कई दिनों से एक चिड़िया मरी हुई पड़ी थी। उसके पूरे शरीर में कीड़े पड़े हुए थे। इस कारण पूरा पानी विकृत हो गया था। वह विषाक्त पानी ही रोग का कारण था। जैन परिवार में इस रोग का प्रभाव न होने का कारण केवल छना जल का उपयोग ही था।
आजकल जो नल का पानी आता है, कई बार उसमें नाली का पानी भी मिल जाता है। कभी-कभी उस नल के पानी में केंचुए भी देखे गए हैं। ऐसी घटनाएं आए दिन समाचार पत्रों में छपती रहती हैं। अतः पानी को छानकर ही पीना चाहिए।
पानी छानने की विधि
जिस वस्त्र से सूर्य का बिम्ब न दिखे, ऐसे अत्यंत गाढ़े वस्त्र को दोहरा करके जल छानना चाहिए। छन्ने की लंबाई, चौड़ाई से डेढ़ गुनी होनी चाहिए। ऐसा करने से अहिंसा व्रत की रक्षा होती है तथा त्रस जीवों का रक्षण होने से मांस भक्षण के दोषों से बचा जा सकता है। जल छानने के बाद छन्ने से बचे हुए जल को दूसरे पात्र में रखकर उसके ऊपर छने हुए जल की धार छोड़नी चाहिए। उसके बाद उसे मूल स्रोत में पहुँचा देना चाहिए। इसके लिए कड़ीदार बाल्टी रखी जाती है, जिसे जल की सतह पर ले जाकर उड़ेला जाता है। ऐसा करने से उन जीवों को धक्का नहीं लगता तथा करुणा का पालन होता है। उक्त क्रिया को जीवाणी कहते हैं। छना हुआ जल एक मुहूर्त तक, सामान्य गर्म जल 6 घंटे तक, पूर्णतया उबला हुआ जल 24 घंटे तक उपयोग करना चाहिए। इसके बाद इसमें त्रस जीवों की पुनः उत्पत्ति की संभावना रहने से हिंसा का दोष लगता है।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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