आज का आदमी भोजन कम, विचार ज्यादा खाता है
आज का आदमी भोजन कम, विचार ज्यादा खाता है
(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)
आज का आदमी भोजन कम विचार ज्यादा खाता है। चरित्र और चित्त की शुद्धि ही धर्म है। शुद्ध चरित्र से चित्त शुद्ध होता है और शुद्ध चित्त से चेतना विशुद्ध होती है। धर्म आत्म-गत है। धर्म पहले मनुष्य के चित्त में प्रकट होता है, फिर चरित्र में झलकता है।
मनुष्य के मन में क्रोध, मोह, लोभ आदि कई विकृतियां पनप रही हैं। इसलिए मन धर्म को धारण नहीं कर पा रहा है। क्रोध, मान, माया और लोभ से मलिन मन धर्म की आत्मा को नहीं समझ सकता। धर्म की आत्मा को समझना है, तो मलिन मन की शुद्धि परम आवश्यक है। भोजन ग्रहण करते समय उसमें चित्त नहीं है तो भोजन अधूरा है और जेब में वित्त नहीं है तो आदमी अधूरा है।
कुत्ते को कुछ खाते समय ध्यान से देखो। जब वह कुछ खाता है तो अपनी दुम नहीं हिलाता। अतः भोजन करने बैठो तो सिर्फ भोजन में ध्यान करो, विचारों को मत खाओ। आज का आदमी टी.वी. के सामने भोजन करने बैठता है तो भोजन कम करता है और विचार अधिक ग्रहण करता है। याद रखें, पेट विचारों से नहीं रोटी से भरता है। आदमी दरवाज़े से अंदर प्रवेश करता है, दीवारों से नहीं।
अतः शुद्ध भोजन के साथ-साथ शुद्ध विचार ग्रहण करो।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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धन्यवाद।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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