स्व समाधि कला

स्व समाधि कला

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)

जैन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह केवल जीने की ही नहीं, अपितु मरने की भी कला सिखाता है। हमने अब तक अनंत भवों में जन्म और मरण किया है, लेकिन अभी तक मरने की कला को नहीं सीखा। यदि हमारा जन्म हुआ है, तो मरण भी सुनिश्चित है। एक बार हमारा मरण सुधर गया, तो आने वाले अनेक भव सुधर जाएंगे। इसलिए हमें मरने की कला भी सीखनी चाहिए।

वास्तव में सल्लेखना पूर्वक मरण ही व्यवस्थित मरण है। चतुर्गतियों में तुमने अनंत बार जन्म लिया है और जीवन भी जिया है। कितने भेष बदले, कितने भाव बदले, कितने भव बदले, परन्तु आज तक भवातीत नहीं हुए। पुण्य के सद्भाव में व्यक्ति को पाप की काली परछाइयाँ नजर नहीं आती हैं। ध्यान रखना - मृत्यु के समय न पुण्य काम में आएगा, न भगवान काम में आएंगे। बस! तेरे अच्छे-बुरे भाव ही काम में आएंगे। तेरा अगला भव तो तेरे भावों से ही बनेगा, क्योंकि चाहे तू किसी भी गति में जन्म लेगा तो ये चारों गतियां दुख के कारण ही हैं। सच्चा सुख कहीं पर नहीं है। यदि सच्चा सुख चाहिए तो वह है पंचम गति में, जो मोक्ष कहलाता है। वहीं पर अनन्त काल के लिए सच्चा सुख मिल सकता है।

तुम सोचते होंगे कि देव गति में तो सुख मिलेगा, लेकिन वहाँ भी अच्छे भावों से मरण करने वाला जीव ही धर्मध्यान में लीन हो सकता है और संयम तो वहाँ है ही नहीं, इसलिए वहाँ भी सुख नहीं है, केवल सुख का आभास है, जिसे हम जन्नत के सुख कह देते हैं। यदि हमने एक बार समाधि मरण कर लिया तो निश्चित ही कुछ भवों में हमें मोक्ष मिल जाएगा।

समाधि धारण करने से पहले इंद्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण करना पड़ेगा। जिसमें सबसे बड़ी रसना इंद्रिय है जो व्यक्ति को समता के भाव में नहीं रहने देती। समाधि समाधि ही होती है, यह अकाल मरण नहीं कहलाता। समाधि का अर्थ है - शरीर और मन के कषाय को अपने वश में करना। आयु कर्म के पूर्ण होने पर शरीर तो बचेगा नहीं, इसलिए पंच परमेष्ठी की आराधना करते हुए निर्मल भावों से प्राणों का विसर्जन करना ही समाधिमरण है।

अपनी आत्मा रूपी हंस को परमहंस बनाकर ले जाना - इसका नाम समाधि है। ध्यान रखना, शरीर को तो सुखा डाला परंतु कषाय नहीं सूखी तो समाधि नहीं होगी। राग वश विष खा लेना या फांसी लगा लेना उसे कहते हैं आत्मघात। समाधि मरण में कोई फांसी नहीं लगाई जाती या अग्नि में नहीं जला जाता। इसमें तो निर्मल भावों से आयु पूर्ण की जाती है। अपने आत्म परिणामों को निर्मल करने की प्रवृत्ति का नाम ही सल्लेखना है। अतः जीवन में मरने की कला को सीखना ही समाधि है।

ओऽम् शांति सर्व शांति!!

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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