रुचि बिना कुछ भी पाना असंभव

रुचि बिना कुछ भी पाना असंभव

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)

जब तक किसी लक्ष्य को पाने के लिए हमारी अंतरंग रुचि जागृत नहीं होगी, तब तक हमें उस लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती, फिर चाहे हम उसके लिए कुछ भी प्रयत्न करते रहें। सफलता पाने के लिए हमारी अंतरंग रुचि ही आधारशिला का काम करती है।

जैसे आधार (नींव) के बिना मकान बनाना तो बहुत दूर, मकान की एक दीवार भी नहीं खड़ी हो सकती, मन की उमंग के बिना किसी भी कार्य को इच्छा के अनुसार संपूर्णता तक पहुंचाना संभव नहीं हो सकता, ठीक वैसे ही भावात्मक ऊँचाई के बिना जिंदगी के आधार अर्थात् सम्यक् दर्शन को पाना पूर्णतया असंभव है।

उमंग या रुचि पैदा करने के लिए हमें वस्तु की तीव्रता से चाह होनी अति आवश्यक है। जितनी इच्छाशक्ति तीव्र होती है, कार्य में गति और उत्साह उतना ही तीव्र होता है। इच्छाशक्ति हमें उस कार्य के लिए प्रेरित करती है। वही हमें सही ज्ञान व दिशा देकर, हमारे ज्ञानचक्षु खोलकर हमारा रास्ता कंटकों से रहित कर देती है। ज्ञान की दूरबीन न हो तो मार्ग दिखना कठिन हो जाता है। कई लोग इच्छा तो रखते हैं लेकिन सफल नहीं हो पाते।

आज वर्तमान परिप्रेक्ष्य में एक नज़र उठा कर देखें तो यह स्पष्ट नज़र आता है कि किसी के पास थोड़ा है, किसी के पास कुछ ज्यादा है और किसी के पास बहुत ज्यादा है। किसी के पास धन रखने के लिए जगह नहीं है और कोई दो समय की रोटी के लिए भी तरस रहा है। कहने में आ जाता है कि ईश्वर ने ऐसा भेदभाव क्यों किया? यदि ईश्वर ने किया है, तो ईश्वर एक है। तो क्या वह भी लोगों के साथ भेदभाव करता है? तो इसका उत्तर है कि यह काम ईश्वर का नहीं है। यह काम हमारी अपनी-अपनी ऊँची या छोटी उमंग का परिणाम है। किसी ने परमात्मा की भक्ति में बहुत ज्यादा उमंग और रुचि दिखाई, तो आज वह उसका बहुत प्रतिफल प्राप्त कर रहा है। किसी ने कम उमंग दिखाई तो आज उसे कम उपलब्धि हुई, लेकिन जिसने परमात्मा की भक्ति में उमंग ही नहीं दिखाई, आज उसे कुछ भी नहीं मिला।

जो परमात्मा की भक्ति करने वालों की उमंग में बाधा डालता है, वह भूखों मरने की कगार पर आ जाता है। अकाल मौत का शिकार होकर प्राणों से हाथ धो बैठता है। चाहे कोई संसार का कार्य हो या धर्म का, हर क्षेत्र में हमारी उमंग की लहर ही हमारी शक्ति को ऊर्जावान बनाती है। जैसे ड्राइवर के बिना कार बेकार है, उसी तरह रुचि के बिना कार्य में सफलता की उम्मीद करना बेकार है। यदि हमारे सामने भोजन के 56 प्रकार के सर्वोत्कृष्ट व्यंजन रखे हों और मन में खाने की उमंग न हो, तो वे व्यंजन हमारे लिए मिट्टी के समान हैं। तीर्थंकरों के जन्म से पहले उनके आँगन में रत्नों की बरसात हुई लेकिन जब तीर्थंकर के मन में वैराग्य का भाव है, तो वे सारे रत्न उनके लिए काँच और पत्थर के समान मूल्यहीन हो गए।

अतः रुचि ही अपनी मंज़िल तक पहुँचाने वाली है। उसके बिना किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं हो सकती। कार्य के प्रति रुचि ही हमारे जीवन को सफल बनाएगी।

ओऽम् शांति सर्व शांति!!

विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद।

--

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

Comments

Popular posts from this blog

स्वतंत्रता दिवस

जीवन में गति है पर दिशा नहीं

प्रभु को प्राप्त करना है