दुर्भावना ही विष है और सद्भावना ही अमृत

दुर्भावना ही विष है और सद्भावना ही अमृत

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विरंजनसागर महाराज की लेखनी से)

हमारे जीवन में दुर्भावना ही विष का काम करती है और सद्भावना अमृत के समान जीवनदायिनी होती है। अध्यात्म से विमुख आज का मनुष्य संप्रदाय, मजहब और मतान्तर की संकीर्ण चारदीवारी में कैद हो गया है। इसलिए मानवता स्वार्थ, विषमता, नफरत और द्वेष की आग में जल रही है। सच्चा धर्म तो मानव समाज को एकता के सूत्र में बांधता है।

सच्चा धर्म स्वार्थ की विष बेल को नष्ट करके प्रेम, सौहार्द, सहिष्णुता, दया, करुणा, मैत्री और सद्भावना बढ़ाता है। समाज को जागृत करके सुख-शांति एवं आनंद का साम्राज्य स्थापित करता है। जो धर्म मानव को मानव से लड़वाता है, वह धर्म नहीं हो सकता।

जनता की भावनाओं को भड़का कर समाज को नफरत की आग में जलाने वाले, धर्म के नाम पर हिंसा फैलाने वाले लोग न ही धर्म के पथ-प्रदर्शक हैं और न धार्मिक नेता कहलाने योग्य हैं। ऐसे धार्मिक नेताओं ने ही समाज को हिंसा और आतंक के माहौल में जलने के लिए मजबूर किया है।

सच्चा संत, महात्मा या धार्मिक व्यक्ति धर्म और अध्यात्म को आत्मसात करने वाला और समदर्शी होता है। वह आध्यात्मिक ज्ञान द्वारा सर्वव्यापक परमात्मा को अपने अंदर अनुभव करके लोगों को दिशा निर्देश देता है। आत्मा की दृष्टि से सब का वास्तविक स्वरूप भी तत्वतः एक ही है। सभी में जीव तत्व समान रूप से विद्यमान है।

प्रत्येक जीव में एक ही परमात्मा को देखने और समझने वाला मानव भला कैसे समाज में हिंसा की भावना फैलाकर मानव के विनाश का षड्यंत्र रच सकता है? वह तो सब से प्रेम करने का संदेश देता है और सर्वजन हिताय-बहुजन सुखाय के लिए प्रयत्नशील रहता है।

ओऽम् शांति सर्व शांति!!

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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