नारी के नयनः करुणा के भंडार

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

नारी के नयनः करुणा के भंडार

महानुभावों! नारी की आँखें करुणा की कटोरी हैं जो शत्रुता से अनछुई हैं। इन घृतधारिणी जननियों ने ज़िन्दगी के प्रति उदासीन पुरुषों के बुझते हुए शौर्यदीप में सदैव साहस और उत्साह की घृताहूतियाँ दी हैं। नारी समाज ने भोगों में आकण्ठ लिप्त महापुरुषों को सदा सावधान करके पतन की राह से बचाया है।

कटी पतंग की तरह निराशा से टूटे हुए पुरुषों को नारियों ने आशाओं की गाँठ बाँधकर उतुंग ऊँचाइयों का दर्शन कराया है। सुधाधर तुल्य विशुद्ध शील धर्म, कल्प वृक्ष रूपधर्मनिष्ठ नारियों ने पुरुषों की चित्तवृत्ति को विगत की दशाओं, अनागत की आशाओं से पूर्णतः हटा कर आगत में ले जा कर खड़ा किया है।

राजा श्रेणिक के सम्यक्त्व लाभ एवं तीर्थंकर प्रकृति के संचय में रानी चेलना की भूमिका को प्रथम श्रेय दिया जाता है। मुनि श्री ने कहा कि ‘नारी गुणवती हनो सर्गः सुष्टेरिग्रमपदमं’ अर्थात् गुणवती स्त्री नारी जाति में अग्रगण्य है।

विपद् ग्रस्त पुरुष नारी का हाथ छोड़ सकता है पर नारी कभी पुरुष का साथ नहीं छोड़ती। यदि नारी में एक छोटा सा भी दुर्गुण हो तो वह पुरुष की आँखों का काँटा बन जाती है। फिर पुरुष या तो उसे जंगल में छुड़वा देता है या तलाक देकर घर से निकाल देता है। दूसरी ओर दमयंती का आदर्श है जिसने जुए में सर्वस्व हारे हुए राजा नल का साथ कभी नहीं छोड़ा। बंधुमति ने वैश्यासक्त चारूदत्त का घर लौटने पर पूर्ववत् स्वागत-सत्कार किया। युद्ध के लिए प्रस्थान करते हुए पवनजंय के वाक् बाणों के प्रहार को (जैसे अमंगलमुखी या मंगलवेला में सामने क्यों आ गई?) एवं पाद् प्रहार को अंजना यह सोच कर सहन कर गई कि आाखिर मैं कितनी भाग्यशाली हूँ जो 12 वर्ष से पति दर्शन से वंचित मुझे पाद् प्रहार के बहाने पति के चरणों का स्पर्श तो मिला और मेरे तरसते कर्ण-पुटों में अमृत-तुल्य कुछ शब्द तो पड़े।

मानसरोवर तट पर मित्र सहित छिप कर मिलने के लिए आए पवनजंय का उसने मुक्त हृदय से स्वागत किया। न कोई प्रश्न, न कोई शिकायत। गमन के प्रभात में अमंगलकारी कहने वाले रात्रि में उस अमंगला का मुख देखने क्यों आ गए? पवनजंय की इच्छा पूरी करने के बाद अंजना ने उनके चरणों में सिर रखकर सिर्फ इतना ही कहा - हे आर्यपुत्र! मेरे किस अपराध ने आपको मुझे परित्यक्ता घोषित करने पर बाध्य किया?

क्रूर कर्म को अभी इतने पर भी संतोष नहीं हुआ। अपने पति द्वारा आरोपित बीज को उसने लांछन सहते हुए भी सतर्कता से संभाला और जंगल में जन्म दिया किंतु कभी पति के प्रति ग्लानि का भाव स्वप्न में भी उसके हृदय में नहीं आया। क्या ऐसा आदर्श चरित्र कभी पुरुष नायक में देखा गया है?

मुनि श्री ने कहा कि पति के लिए शील, संतान के लिए ममता, समाज के लिए अपने दिल में करुणा संजोकर, सूर्य जैसा तेज, पृथ्वी जैसी क्षमा, पर्वत जैसी दृढ़ता, चंद्रमा जैसी शीतलता, समुद्र जैसा गांभीर्य, पर्वत जैसी ऊँचाई, आकाश जैसी विशालता और वृक्षों जैसा त्याग जहाँ एक स्थान पर हो, उसी का नाम नारी है।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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