अहिंसा

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

अहिंसा

अहिंसा भीरुता नहीं अपितु वीरता की पहचान है।

महावीर की अहिंसा क्षत्रिय की अहिंसा है, किसी कायर की नहीं। अहिंसक होने का यह अर्थ नहीं है कि तुम्हारा दुश्मन तुम्हारा सिर काटने के लिए आए तो तुम सिर झुका कर बैठ जाओ। गृहस्थ जीवन में विरोधी हिंसा का त्याग नहीं होता।

यदि तुम्हारे घर, परिवार, धर्म, गुरु पर कोई आततायी आक्रमण करे और तुम्हें उनकी रक्षा करने के लिए शक्ति का प्रयोग करना पड़े या हथियार उठाना पड़े तो उस अवस्था में गृहस्थ को आत्म रक्षा की पूर्ण आज्ञा है। गृहस्थ जीवन में संकल्पी हिंसा का त्याग होता है। यहाँ हिंसा से तात्पर्य प्रयोजनी हिंसा से है। संकल्प पूर्वक किसी प्राणी को पीड़ा देना या उसके प्राणों का घात करना संकल्पी हिंसा है।

अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं वरन् करुणा की पराकाष्ठा है। आज देश में जो हिंसा का दौर शुरू हो रहा है, वह देश के भविष्य के लिए एक खतरनाक संदेश है। मांसाहार और नशे की प्रवृत्तियाँ जिस गति से बढ़ रही हैं, यह मानव जाति के विनाश का प्रतीक हैं। मांसाहार घोर पाप है, क्रूर कर्म है। इससे बचें।

राष्ट्र का हित अहिंसा में निहित है। हिंसा के मार्ग पर चल कर कोई भी व्यक्ति या राष्ट्र दीर्घजीवी नहीं हो सकता। अतः हिंसा से बचो और देश बचाओ।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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