स्वार्थ विनाश की जड़ है

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

स्वार्थ विनाश की जड़ है

नमो वृषभसेनादि-गौतमान्त्य-गणेशिने

मूलोत्तर गुणाध्याय सर्वस्यै मुनये नमः

महानुभावों! एक दिन कन्छेदीलाल का बेटा बहुत चिन्तित था। कन्छेदीलाल ने पूछा - बेटा! क्या बात है? तू बहुत चिन्तित दिखाई दे रहा है। बेटे ने कहा - मैं बहुत दुविधा में हूँ। मैं सोच रहा हूँ कि मैं दाँतों का डॉक्टर बनूं या कानों का। कन्छेदीलाल ने कहा - इसमें सोचने की क्या बात है? तुम दाँतों के डॉक्टर बनो। बेटा बोला - वह क्यों? कन्छेदीलाल ने कहा - सामान्य सी बात है। आदमी के कान तो केवल दो ही होते हैं पर दाँत तो 32 होते हैं। दाँतों का डॉक्टर बनने से Source of Income भी अच्छा हो जाएगा। कमाई ज्यादा होगी।

यही हाल तुम्हारा है। तुम हर कृत्य के पीछे लाभ-हानि की बात सोचते हो। तुम्हारा हर कर्म लोभ से परिचालित होता है। तुम परमात्मा की पूजा भी करते हो तो यह सोच कर कि इससे क्या लाभ होगा? पूजा परमात्मा के लिए की जाती है या Profit के लिए। प्रार्थना और पूजा को भी तुमने व्यवसाय बना लिया है। भगवान कहते हैं कि पूजा निदान-रहित, कामना-रहित होनी चाहिए। इसी आशय को ‘गीता’ में श्री कृष्ण ने ‘निष्काम कर्म’ कहा है। राष्ट्र व समाज की सेवा केवल वही कर सकता है जो स्वार्थ से परे है। स्वार्थी व्यक्ति कभी निज-पर का विकास नहीं कर सकता बल्कि विनाश ही करता है क्योंकि स्वार्थ विनाश की जड़ है और निःस्वार्थ होना विकास का मूल।

बन्धुओं! संसार न तो शुभ है और न ही अशुभ है। तुम्हारा शुभ व्यवहार उसे शुभ बना देता है और अशुभ व्यवहार उसे अशुभ बना देता है। तुम जिस दृष्टि से संसार को देखते हो, वह वैसा ही दिखता है।

एक घटना याद आ गई। कन्छेदीलाल ने लल्लूलाल से पूछा - भैया लल्लूलाल! शादी के समय दूल्हा घोड़ी पर बैठ कर क्यों जाता है, गधे पर क्यों नही? लल्लूलाल ने कहा - अरे कन्छेदीलाल! इसका तो सीधा-सा उत्तर है। कन्छेदीलाल ने पूछा - क्या? लल्लूलाल ने कहा - वह इसलिए, कि दुल्हन कहीं दो गधों को एक साथ देखकर डर न जाए। अब यह तुम्हारा दृष्टिकोण है, दुल्हन का नहीं।

तुम्हारी दृष्टि जैसी होगी, सृष्टि भी वैसी ही दिखेगी। संत, मुनि भी तो इसी सृष्टि में ही रहते हैं लेकिन वे इसमें भी आनंद खोज लेते हैं और सुख भोगते हैं। गुलाब के पौधे में फूल भी होते हैं और काँटे भी। अब यह तुम्हारा निर्णय होगा कि तुम फूल चुनते हो या काँटे। संसार में अमृत भी है और विष भी। क्या चुनना है? चुनाव के लिए तुम पूरी तरह स्वतन्त्र हो।

कल ही एक सज्जन कह रहे थे कि मुनि श्री, आप ख़तरनाक बोलते हो। मैं ख़तरनाक नहीं ख़रा बोलता हूँ। दूध का दूध और पानी का पानी करता हूँ। तुम्हारा दूध नकली है, तभी तो तुम्हें तकलीफ़ हो रही है, तभी तो तुम भयभीत हो। वे ही लोग संतों और मुनियों से भयभीत होते हैं और दूर भागते हैं, जिनका दूध खालिस नहीं होता। आपने ख्याल किया होगा कि कुछ पंडित मुनियों के सामने आने से कतराते हैं, जी चुराते हैं। यदि किसी मुनि का कल नगर में आगमन हो रहा हो तो वे आज रात को ही नगर से भाग निकलेंगे। पता है, वे क्यों भागते हैं? जैसे सूर्य निकलता है तो अंधकार स्वयं ही भाग जाता है, उसे भागना ही पड़ता है क्योंकि अंधकार नकली है, झूठ है।

सूरज के उदित होते ही उल्लुओं को बहुत तकलीफ होती है और मुनियों के आने से तथाकथित पंडितों व पुरोहितों को वेदना होने लगती है। उल्लुओं को सूरज अपना दुश्मन लगता है। उल्लुओं के पास ऐसी दिव्य आँखें नहीं हैं जो वे सूरज से आँखें मिला सकें। इसी प्रकार मुनि, पंडितों व पुरोहितों के दुश्मन नहीं हैं लेकिन उनके पास इतना पाक-साफ हृदय नहीं है जो वे संतों के सान्निध्य में बैठ सकें। वे पंडित कम, पाखंडी अधिक हैं। असली ज्ञानी पंडित मुनियों के पास ही रहते हैं, उनके साथ ही रहते हैं। वे उनसे दूर नहीं भागते। वे संत-मुनियों की ओर भागते हैं।

संतों की वाणी बन्दूक की गोली की तरह सीधी हृदय में लगती है जिससे मरी हुई धर्म-श्रद्धा पुनः जीवित हो जाती है। संत की उपस्थिति कुछ लोगों को अच्छी नहीं लगती बल्कि खलने लगती है क्योंकि वे तुम्हारे अहंकार पर चोट करते हैं पर यह चोट तो तुम्हारे खोट को निकालने के लिए ही लगाई जाती है। संत निःस्वार्थ भावना से सब का हित चाहते हैं।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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