राग भाव से क्रोध की उत्पत्ति होती है
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
राग भाव से क्रोध की उत्पत्ति होती है
महानुभावों! राग भाव से ही क्रोध की उत्पत्ति होती है। क्रोध को अग्नि के समान कहा गया है। इसके जलने से आत्मा संतप्त होने लगती है। जब हम इस अग्नि को क्षमा रूपी जल से शांत करके इस पर विजय प्राप्त करते हैं, तब अतीन्द्रिय सुख की प्राप्ति हो सकती है।
मुनि श्री कहते हैं कि मोह और दुःख दोनों एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं क्योंकि किसी व्यक्ति, वस्तु या स्थान के प्रति राग भाव ही दुःख का मूल कारण है। हम प्रतिदिन किसी न किसी की मृत्यु का समाचार सुनते हैं पर उससे हमें दुःख का उतना अहसास नहीं होता जितना कि अपने किसी सगे संबंधी की मृत्यु के समाचार को सुन कर होता है। क्या आपने कभी इसका कारण जानने की चेष्टा की? इसके मूल में रागभाव ही है। यही भाव हमारी आँखों से आँसुओं का सैलाब बनकर निकलता है। किसी दूसरे की मृत्यु को तो हम एक समाचार से अधिक महत्व नहीं देते। न हमारा मन दुखी होता है और न हम उस समाचार को अधिक समय तक याद रखते हैं।
जिस व्यक्ति, वस्तु या स्थान को हमने अपना मान रखा है उसके वियोग में हम तड़पने लगते हैं और परेशान होते रहते हैं। मुनि श्री आगे कहते हैं कि जीव आत्मा में राग की परिणति क्रोध के रूप में परिवर्तित हो जाती है और क्रोध हमारी आत्मा का प्रबल शत्रु है। आत्मा को क्रोधाग्नि में जलना पड़ता है। वह अपने शांत स्वभाव को छोड़कर विभाव में विचरण करने लगती है जो तीव्र कर्म बंध का कारण है।
इसीलिए धर्म का मुख्य उद्देश्य सर्वप्रथम कषाय का भेदन करना बताया गया है क्योंकि जब तक क्रोध, मान, माया और लोभ ये चारों कषाय समाप्त नहीं होंगे तब तक हमारी आत्मोन्नति संभव नहीं है।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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