पर से ममत्व के कारण ही जीव बंधता है
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
पर से ममत्व के कारण ही जीव बंधता है
हे विज्ञात्मन्! आत्मा ममत्व-भाव से रहित, निर्ममत्व-स्वभावी है। ममत्व भाव बंध का हेतु है, निर्ममत्व भाव निर्जरा का। जितने जीव आज तक कर्म-बंध को प्राप्त हुए हैं, वे सब ममत्व भाव से ही हुए हैं। रावण जैसा बलशाली व्यक्ति एक नारी के ममत्व में निर्बल हो गया। सत्यंधर राजा नारी के ही ममत्व में काष्ठांगार के द्वारा नष्ट किया गया।
जीव राग द्वारा संसार से बंधता है और सिद्धान्त की भाषा में कर्मबंधन से बँधता है। एक-एक इंद्रिय-विषय के कारण जीव कर्मबंध को प्राप्त होते हैं तथा अपने प्राणों को खो बैठते हैं। हाथी स्पर्शन-इंद्रिय के विषय के कारण, मछली रसना इंद्रिय के विषय के कारण, भ्रमर घ्राण-इंद्रिय के ममत्व के कारण, पतंगा चक्षु-इंद्रिय के कारण और सर्प कर्ण-इंद्रिय के विषय के कारण अपने प्राणों को नष्ट करता है।
एक-एक इंद्रिय के विषय में ममत्व के कारण इन जीवों की यह अवस्था हुई। फिर जरा विचार कर, भो मनीषी! तू तो पाँचो ही इंद्रिय-विषयों में ममत्व को प्राप्त है, तेरी क्या गति होगी? स्वयं के प्रति प्रयास कर। क्या भववारिधि में गोते लगाता रहेगा? तुझे स्वयं के प्रति बिल्कुल करुणा उत्पन्न नहीं होती? अरे भाई! इस आत्म स्वाद की प्राप्ति के लिए देवेंद्र, धरणेन्द्र तरसते हैं, क्योंकि वह स्वाद जिन-भेष को धारण करके ही प्राप्त किया जा सकता है, अन्य भेष में नहीं।
वह जिन-भेष देवों में होता नहीं, इसलिए देव भी जिन-भेष की प्राप्ति हेतु मनुष्य-भव की सराहना करते हैं। परंतु धिक्कार है उस जीव को, जिसने मनुष्य-देह, उत्तम धर्म व कुल प्राप्त करके भी आत्मानंद-प्रदायक निर्ममत्व-भावयुक्त जिन-भेष को धारण नहीं किया। अवश्य ही उस जीव का पुण्य अभी कमजोर है। पुण्य की वृद्धि कर मंद कषाय के द्वारा, फिर तू निर्ममत्व-अवस्था को प्राप्त कर।
न करता शिकायत जमाने से कोई,
अगर मान जाता मनाने से कोई।
किसी को याद करता क्यों कोई,
अगर भूल जाता भुलाने से कोई।।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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