पद-यात्रा
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
पद-यात्रा
यह पद-यात्रा इशारा है परमात्मा से जुड़ने का।
महानुभावों! मनुष्य में अनंत संभावनाएं हैं। यदि वह जीवन के रहस्य को समझ ले तो अनंत ऊँचाइयों तक पहुँच सकता है। मनुष्य में ईश्वर की अनुभूति है, खुदा का नूर है। मनुष्य महान है क्योंकि वह भगवान का प्रेमी है, भगवान के पथ का अनुगामी है। मनुष्य कहलाने का अधिकारी वही है जो मनन करता है और मनन करके सिर्फ उसे ही मानता है जो शुभंकर है, श्रेयस्कर है।
एक बार भगवान महावीर स्वामी से गौतम स्वामी ने पूछा कि भंते! सोना अच्छा है या जागना। महावीर ने कहा कि कुछ जीवों का सोना अच्छा है और कुछ जीवों का जागना।
”अच्छा!“ गौतम असमंजस में पड़ गए। उन्होंने पुनः पूछा - ”मैं समझा नहीं, कृपया स्पष्ट करें।“
तो महावीर स्वामी ने कहा - ”जो मनुष्य अधर्मी हैं, पापी हैं, दुष्ट हैं उनका सोना अच्छा है, क्योंकि वे जब तक जागेंगे तब तक हिंसा करेंगे, ईर्ष्या करेंगे, दूसरे को आघात पहुँचाएंगे। ऐसे मनुष्यों का तो सोना ही अच्छा है और जो धार्मिक हैं, ज्ञानी हैं, सज्जन हैं उनका जागना अच्छा है क्योंकि वे जब तक जागेंगे तब तक संसार के हित में कुछ न कुछ करते रहेंगे। तो पापी को जागने मत देना। प्रयास करना, प्रार्थना करना कि वह ज़्यादा से ज़्यादा देर तक सोता रहे। उसके सोने में ही दुनिया का भला है, कल्याण है और संत मुनि को सोने मत देना क्योंकि संत मुनि सो जाएंगे तो दुनिया का कल्याण रुक जाएगा, दुनिया का भाग्य सो जाएगा। इसीलिए तो संत भूले भटकों को सन्मार्ग बताते हुए सच्ची राह दिखाते रहते हैं।
मुझे एक घटना याद आ गई। कन्छेदीलाल बिस्तर पर लेटा-लेटा हाथ-पैर पटक रहा था। तभी लल्लूलाल पहुँचे और बोले - ”अरे कन्छेदीलाल! यह तू क्या नाटक कर रहा है?“ कन्छेदीलाल ने कहा - ”लल्लूलाल! यह नाटक नहीं, दरअसल मैं तैरना सीख रहा हूँ।“ लल्लूलाल ने पूछा - ”यह अभ्यास कितने दिनों से चल रहा है?“ कन्छेदीलाल ने कहा - ”अठारह साल हो गए, लल्लूलाल! अब तक मुझे तैरना नहीं आया। पता नहीं, भूल कहाँ हो रही है?“
सबको पता है कि भूल कहाँ हो रही थी। मुझे भी पता है, तुम्हें भी पता है लेकिन उस बेवकूफ कन्छेदीलाल को ही नहीं पता कि तैरना सीखना हो तो पानी में जाना होगा, पानी में डूबना होगा, जल का स्पर्श करना होगा। तैरना पलंग पर नहीं, पानी पर सीखा जाता है। परमात्मा तक Plane पर या किसी पुष्पक विमान पर बैठ कर नहीं, पैदल चल कर ही पहुँचा जा सकता है।
यह पदयात्रा एक इशारा है परमात्मा से जुड़ने का। इस पदयात्रा में आनंद तो आएगा ही लेकिन परम आनंद तो परमात्मा से साक्षात्कार करने पर ही संभव है। जो पदयात्रा आप प्रारंभ कर रहे हैं, यह तो भले ही दस दिन में समाप्त हो जाएगी पर जिस पदयात्रा का संदेश देने के लिए यह पदयात्रा प्रारंभ की जा रही है, वह पदयात्रा आपकी सतत चलती रहनी चाहिए।
जब तक परमात्मा नहीं मिल जाएं तब तक यह पदयात्रा चलनी चाहिए। बाहर तो बहुत चल लिया, अब अन्तर्यात्रा पर चलो क्योंकि परमात्मा तक एक सत्यान्वेषी अन्तर्यात्रा पर चल कर ही पहुँचा जा सकता है। आप सभी इस पदयात्रा में जुड़े, यह बहुत प्रसन्नता का विषय है पर मैं तो वीर प्रभु से यही प्रार्थना करता हूँ कि आपकी यह पदयात्रा सुखपूर्वक आंतरिक शक्ति के साथ बढ़ती हुई, निर्वाण पथ पर चलती हुई मोक्ष महल में जा कर समाप्त हो।
बन्धुओं! इस दस दिवसीय सद्भाव समन्वय संस्कार पदयात्रा का उद्देश्य यही है कि आज मनुष्य कठोर हो गया है, उसके हृदय में करुणा के स्रोत सूखते जा रहे हैं, भाई जिंदा है पर भाईचारा मर रहा है। मनुष्य संवेदनशीलता खोता जा रहा है। यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है। इस पदयात्रा के माध्यम से मैं तुम्हारी चेतना को जगाना चाहता हूँ। तुम्हें इंसानियत का पाठ पढ़ाना चाहता हूँ। मानवता के नाम परमात्मा का पैगाम सुनाना चाहता हूँ। तुम्हें तुम्हारी संस्कृति का, परम्परा का, कर्त्तव्यों का बोध कराना चाहता हूँ।
अहिंसा तुम्हारा स्वभाव है, करुणा तुम्हारी नियती है। हिंसा और क्रूरता तो पाश्विक वृत्तियाँ हैं। तुम पशु तो नहीं हो। तुम तो परमात्मा के परमप्रिय पुत्र हो, परमात्मा की सर्वसुन्दर कृति हो फिर परमात्मा के विरोध में क्यों जी रहे हो? मैं यह बताना चाहता हूँ कि तुम क्या थे और क्या हो गए हो। यह जताना चाहता हूँ। अहिंसा, शाकाहार, सह-अस्तित्व व प्रेम का संदेश फैलाना चाहता हूँ। यह पदयात्रा अन्तर्यात्रा बन कर जन-कल्याण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम बन जाएगी, ऐसा मेरा विश्वास है। आपका समय हो चुका है।
अंत में एक छंद सुना कर विराम लेंगे -
”दिल का चिराग जब तलक, तुझसे जले, जलाए जा।
रात भी है गर तो क्या, तू रात को दिन बनाए जा।।“
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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