निज गुणों से जिसे अनुराग नहीं वह धर्मात्मा कैसे?
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
निज गुणों से जिसे अनुराग नहीं वह धर्मात्मा कैसे?
हे हंसात्मन्! उद्यान में खिले सुमनों को देखकर भ्रमर मंडराने लगते हैं। आम्र मंजरियों को देखकर बसंत की बहार में कोकिल बलात् कुहू-कुहू करने लगती है। कोई उसे प्रेरित नहीं करता। कृषक अपनी शस्य-श्यामला भूमि में हरितकाय को देखकर प्रमुदित मना हो जाता है। उसका आनंद अंदर ही अंदर मिठास प्रदान करता है। वह उस क्षण सब भूल जाता है। मात्र अपनी भूमि के ऊपर खड़ी फसल को निहारता है।
भो चैतन्य! आत्म-बगीचे में चरित्र व संयमरूपी फल लगे हैं। उन फलों में मोक्ष-सुख का पराग भरा हुआ है। इस उपवन का तू मालाकार बन जा, आत्मधर्म की माला बनाने के लिए तुझे ज्ञान, वैराग्य के पुष्प मिलेंगे। आत्म-बगीचे में बैठकर तू माला बनाकर अपने स्वामी चैतन्य देव को समर्पित कर दे। वे तुझ पर खुश हो जाएंगे, खुश होकर वे तुझे मोक्ष-शिखर भेंट कर देंगे। तू त्रैलोक्य-तिलक बन जाएगा।
देख चैतन्य! बागवान को अपने द्वारा लगाए नन्हें-2 कोमल पौधों से कितना प्रेम है। वह पल-पल देखकर खुश होता है तथा कहीं मेरे पौधे सूख न जाएं, इसलिए प्रतिदिन जल-सिंचन करता है क्योंकि उसे पौधों में विशाल फलवत् वृक्ष दृष्टिगोचर हो रहे हैं। क्या तुझे अपने बगीचे के प्रति तनिक भी प्रेम नहीं है?
तेरे उद्यान में व्रत, समिति, अनुप्रेक्षा, धर्म गुप्ति, उत्तर गुण, मूल गुण रूपी पौधे पल्लवित हो रहे हैं। क्या तुझे बिल्कुल चिंता नहीं है सूखती बगिया को देखकर? भोगों के, आशाओं के कीड़े चरित्र व धर्म के पौधों को नष्ट कर रहे हैं।
रे मूढ़! एक बार नष्ट हुआ बगीचा पुनः लगाना कठिन हो जाता है। भाषण, प्रवचन से कार्य सिद्ध होने वाला नहीं है। तुझे अपने उपवन की रक्षा स्वयं करनी होगी। निज गुणों में जिसे अनुराग नहीं, वह धर्मात्मा कैसा? वात्सल्य उसके अंदर कहाँ? धर्मात्मा को देखकर धेनु-वत्स जैसा निष्काम, निःकांक्षित प्रेम उमड़ना चाहिए। जैसा गाय को अपने बछड़े के प्रति वात्सल्य होता है, वैसा ही धर्मात्मा को धर्मात्माओं के प्रति माया चारी से रहित, प्रतिफल की भावना से रहित, आत्मगुणों की वृद्धि के लिए निर्मल भावों से युक्त वात्सल्य होना चाहिए।
वात्सल्य-बिन धर्मात्मा के वेष को धारण करने वाला निर्गंध पुष्प के तुल्य है। जो व्यक्ति वात्सल्य से रहित होकर सभी के सम्मान का पात्र बनाना चाहता है, वह मानो गाय के सींगों से दुग्ध निकालकर अपनी भूख दूर करना चाहता है। ज्ञानी, सम्यदृष्टि और चरित्रवान की सुगंध वह वात्सल्य-भाव ही है। जो धर्मात्माओं को देखकर मुदित नहीं होता बल्कि अनादर करता है, वह धर्म की अवहेलना करने वाला है। वह न ज्ञानी है, न धर्मात्मा, न ही चरित्रवान्।
आत्मधर्म की सिद्धि के लिए वात्सल्य भाव को जन्म दें।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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