मैं और मेरापन

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

मैं और मेरापन

मैं और मेरापन ही अहंकार का मुख्य भोजन है।

महानुभावों! यदि जीवन का आनन्द लेना चाहते हो तो जीवन में करुणा और मैत्री का विश्वव्यापी संगीत गूंजना चाहिए। जीवन को हथियारों और क्रूर परिणामों की प्रयोगशाला बनाने की अपेक्षा फूलों की क्यारी बनाना चाहिए जिससे हमारा और जगत का कल्याण हो सके और हम सब सुरक्षित रह सकें। विश्व के सभी महापुरुषों ने करुणा, सद्भाव और भाईचारे का संदेश दिया है।

भगवान महावीर ने कहा - जीओ और जीने दो।

बुद्ध ने कहा - वैर से वैर कभी शांत नहीं होता।

जीसस ने कहा - प्रेम ही परमात्मा है।

मुहम्मद और गुरु नानक का भी यही संदेश है जिन्होंने ‘तेरा-तेरा’ कहते कहते अपना तन-मन-धन सब कुछ जन कल्याण के लिए दे दिया।

भारत एक धर्म प्रधान व धर्म निरपेक्ष देश है। यहाँ कई धर्मों व समुदायों के अनुयायी हैं जिनके भिन्न-भिन्न आचार-विचार हैं, जाति-पाति हैं, रहन सहन हैं। भाषाएं व बोलियां भी अलग हैं फिर भी यहाँ अनेकता में एकता और एकता में अनेकता के दर्शन होते हैं। इस देश में मतभेद हैं लेकिन मनभेद नहीं हैं और मैं भी तुमसे यही कहता हूँ कि तुम मतभेद भले ही रख लो पर मनभेद नहीं होना चाहिए क्योंकि मनभेद मनुष्य को मृत्यु की ओर ढकेलता है।

अहंकार और ममकार आध्यात्म साधना की दिशा में सबसे बड़ी बाधाएं हैं और अहं विसर्जन का अभ्यास ही साधना का प्रथम सोपान है।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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