जीवन की दशा और दिशा
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
जीवन की दशा और दिशा
धर्म से ही जीवन की दशा और दिशा सुधरती है।
महानुभावों! आज प्रत्येक मनुष्य का जीवन सुख के स्थान पर दुःख का महासागर बन गया है। आनंद के स्थान पर निराशा दिखाई देती है। सुख का कोष पीड़ा का पर्याय बन गया है।
क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है?
जो भावनाएं हमें सुख और शांति दे सकती थी, उनका लोप हो गया है और वे हैं - धर्म और त्याग की भावनाएं। न हम त्याग की साधना कर पा रहे हैं और न भगवद्भक्ति की भावना। ये भावनाएं तो समाप्त हो गई हैं फिर हम सुख कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
साधना का स्थान संगठन ने ले लिया है जबकि साधना सदैव धर्म की भावना से की जाती है और संगठन संप्रदाय को जन्म देता है। संगठनों की तो बाढ़ सी आ गई है और साधना विलुप्त हो गई है। बंधुओं! मेरा विश्वास संगठन में नहीं साधना में है; संप्रदाय में नहीं अहिंसा और करुणा में है जो सर्वोच्च धर्म है। सच्चा धर्म किसी भी परिस्थिति में हिंसा की अनुमति नहीं देता बल्कि हर हालत में समता और सहिष्णुता का मार्ग प्रशस्त करता है। धर्म ही मनुष्य को जीने की कला सिखाता है तथा टूटे हुए दिलों को जोड़ने का कार्य करता है। धर्म से ही जीवन को सही दिशा मिलती है और तभी उसकी दशा सुधरती है।
धन में बाह्य जगत की सारी सामग्रियाँ खरीदने की ताकत तो है पर अभ्यंतर जगत के सभी सद्गुणों को भीतर खींच कर लाने की ताकत केवल प्रेम में ही है।
किसी विक्षिप्त को तो हम पागल भी कह सकते हैं पर यदि आपको आपके पागलपन के बारे में बताया भी जाए तो आप उसे स्वीकार ही नहीं करेंगे। क्रोध करने वाला कभी यह स्वीकार नहीं करेगा कि उसने क्रोध किया या क्रोध करके कोई गलत काम किया। कुछ लोग तो आदतन क्रोध करते हैं। मास्टर जब तक बच्चों को डांट-डपट न ले या उनकी पिटाई न कर ले तब तक उसे संतुष्टि ही नहीं होती क्योंकि क्रोध उसके व्यवहार में रच बस गया है। जो व्यक्ति आदत से मज़बूर होकर क्रोध करते हैं या अशिष्ट भाषा का प्रयोग करते है, उन्हें यदि अपनी इस आदत को परितुष्ट करने का अवसर न मिले तो यह अशिष्टता उनकी सामान्य बातचीत का अंग बन जाती है। अपशब्दों का प्रयोग वे तकिया कलाम के रूप में करने लगते हैं।
क्रोध करना और किसी को गाली देना एक प्रकार का वमन है जिसे मानसिक वमन या विचारों का वमन कह सकते हैं। लोगों के अन्दर जो दूषित विचार एकत्रित हो जाते हैं वे ही ज़हर उगलते हैं गाली के रूप में और ऐसा नहीं है कि वमन हो जाने के बाद उनके विचार निर्मल हो जाते हों। उसमें और भी वृद्धि होने लगती है। क्या आप ऐसे अपशब्दों को ग्रहण करना चाहेंगे? नहीं! कोई भी समझदार आदमी उनको स्वीकारने की भूल नहीं करेगा।
अभक्ष्य पदार्थ का सेवन करना मनुष्य कर्म नहीं, श्वान कर्म है। यदि कोई नासमझ आदमी आपको दो कटु शब्द कह भी देता है तो उसे एक संयोग मान कर चलो। ऐसा अपमान भाग्य में लिखा था सो हो गया। उसके द्वारा गाली दी जानी थी, सो दी गई। रास्ते पर चलते हुए कोई कुत्ता हम पर भौंकता है तो हम भी पलटकर भौंकना शुरू नहीं कर देते। एक सामान्य आदमी कुत्ते के भौंकने को तो फिर भी सहन कर लेता है पर किसी अपने ने दो कटु शब्द बोल दिए तो सहन नहीं कर पाता, इसीलिए संसार में इतने विवाद और झगड़े होते हैं जो अशांति का कारण बनते हैं।
ज्ञानी की पहचान यही है कि उसे अज्ञानी के आचरण पर क्रोध नहीं आता। हमारे धार्मिक होने की सफलता इसी में है कि हम एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें, अपमान करने के लिए तो दुश्मन ही काफी हैं, लेकिन यदि भाई ही भाई का अपमान करेगा तो हम सम्मान किसका करेंगे? केवल भाई ही नहीं, आज के समय में तो बच्चों की अपने माता-पिता से भी अन बन हो जाती है। इसका एकमात्र कारण एक दूसरे की उपेक्षा, तिरस्कार, अपमान व एक दूसरे की भावनाओं का अनादर ही है। दो संबंधों में अलगाव सदा एक दूसरे के विचारों को न समझ पाने के कारण ही होता है। अतः सभी समस्याओं का निवारण धार्मिक दृष्टिकोण से ही करो, तभी तुम सही दिशा की ओर बढ़ सकोगे।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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