जागना ज़िन्दगी को पाने की सबसे महत्त्चपूर्ण कला है

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

जागना ज़िन्दगी को पाने की सबसे महत्त्चपूर्ण कला है

महानुभावों! जागना ज़िन्दगी को पाने की सबसे महत्त्चपूर्ण कला है। जो व्यक्ति जागना सीख गया तो समझो कि जीना भी सीख गया। उसके लिए अपनी मंज़िल को पाना बहुत आसान हो जाएगा। जागने का मतलब है - जागो, सचेत हो जाओ और जानो। उन कृत्यों से दूर हो जाओ जो हमारे जीवन में अनर्थ पैदा करते हैं, अशांति उत्पन्न करते हैं। जागने का ध्येय है - स्वयं को अखंडित रूप में जानकर स्वयं को पाने का प्रयास करना, स्वयं से परम प्रेम जागृत करना है। मंज़िल को पाने की छटपटाहट पैदा हो जाने का नाम ही जागना है।

मुनि श्री ने कहा कि नींद में सोया हुआ प्राणी स्वयं को ही सत्य समझता है। न जाने कितने अपराध नींद में हो जाते हैं। शायद नींद न होती तो अपराध भी न होते। जागे हुये व्यक्ति के समीप जाने से सुख, आनन्द और प्रसन्नता टपकती हुई प्रतीत होती है जो हमें अन्दर तक भिगो देती है। मुनि श्री ने कहा कि वास्तविक सुख बाह्य साधनों-सुविधाओं में नहीं अपितु मन के संतोष में होता है। मन में असंतोष होगा तो वह भयभीत रहेगा और संतोषी व्यक्ति सदा निर्भय रहेगा। सदा संतोषी ही स्वयं को अमीर मानता है पर असंतोषी धन-संपत्ति होते हुए भी गरीब ही बना रहता है। कहा भी है कि दास बनाने वाला बड़ा नहीं माना जाता बल्कि दासता से मुक्ति दिलाने वाला ही महान होता है।

आज धर्म को धन से तोला जाता है। यह देखकर मन को बहुत पीड़ा होती है। यहाँ तक कि साधु संत भी धनिकों को महत्त्व देने लगे हैं। साधु तो स्वतंत्र और सहज होता है। जिसके मन-मंदिर में भेदभाव की दीवारें होती हैं, वह साधु हो ही नहीं सकता। सच्चे संत को सम्पत्ति नहीं, भक्त की श्रद्धा देखनी चाहिए। स्वयं भी जागृत रहना चाहिए और अपने भक्तों को भी सचेत करते रहना चाहिए।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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