गुरु का दर्ज़ा प्रभु से ऊँचा माना गया है
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
गुरु का दर्ज़ा प्रभु से ऊँचा माना गया है
महानुभावों! गुरु का दर्ज़ा प्रभु से ऊँचा माना गया है। गुरु के बिना गोविन्द अर्थात् भगवान के दर्शन नहीं हो सकते क्योंकि अध्यात्म मार्ग पर चलने के लिए पथ-प्रदर्शक करने वाला गुरु ही होता है। गुरु ही हमें जीवन में आने वाली टेढ़ी-मेढ़ी कंटीली राहों में उलझने से बचाता है। गुरु वह पारस है जिसके स्पर्श मात्र से शिष्य का जीवन सोने के समान दमकने लगता है। जीवन निर्माण की सही दिशा बताने वाले गुरु के बिना हमारा जीवन अधूरा है। जीवन को संस्कारी बनाने का उपक्रम है - गुरु का सम्पर्क।
गुणवान व्यक्ति का सान्निध्य बिना प्रयास के ही जीवन में संस्कारों का निर्माण कर देता है। जो लोग बच्चों में संस्कारों का शिलान्यास करके व्यक्तित्व का निर्माण करना चाहते हैं, जो गुरु के सम्पर्क में आए बिना कुछ पाना चाहते हैं, जो दुर्बुद्धि गुणी जनों का सम्पर्क छोड़ कर कल्याण की आकांक्षा रखता है तो यह मान कर चलो कि वह निर्दयी होकर धार्मिक बनना चाहता है, नीति छोड़कर यशस्वी बनना चाहता है, आँखों की ज्योति खोकर संसार की हर वस्तु देखना चाहता है और मन को चंचल रख कर ध्यान करना चाहता है। केवल चाहने मात्र से कोई वस्तु नहीं मिल सकती। इसी प्रकार सत्सम्पर्क के बिना व्यक्ति अपना कल्याण नहीं कर सकता अर्थात् गुरु के बिना तो जीवन में अंधकार ही अंधकार है।
वास्तव में गुरु की महिमा अपरम्पार है।
मुनि श्री ने कहा कि गुरु बनाने से पूर्व गुरु की सही पहचान करना अति आवश्यक है। मिट्टी का घड़ा खरीदने से पहले हम उसे ठोक बजा कर उसकी ध्वनि को पहचानने की कोशिश करते हैं कि कहीं से टूटा हुआ तो नहीं है, कहीं से दरार तो नहीं है। जितना पानी हम इसमें डालें, उसे यह संभाल सकता है या नहीं। ठीक इसी प्रकार बिना जांचे-परखे हम किसी को अपनी श्रद्धा का पात्र नहीं बना सकते। सच्चे गुरु की परिभाषा बताते हुए मुनि श्री कहते हैं कि जिसमें सागर जैसी गहराई और शिखरों जैसी ऊँचाई हो वही गुरु वंदनीय व पूजनीय होता है। जिसका आचार-व्यवहार स्वच्छ हो, जो स्वयं आगम के आदेशों पर चलता हो और दूसरों को चलने के लिए प्रेरित करता हो, जिसमें अनुशासन बनाने की अद्भुत क्षमता हो, जिसमें युग-चेतना को सही दिशा में ढालने की आर्द्रता हो, जो सतत ज्ञान-ध्यान में संलग्न हो, विषयों की आशा से दूर हो, निष्परिग्रही हो; वही सच्चा गुरु होने का अधिकारी है। सच्चे गुरु की सबसे महत्त्वपूर्ण पहचान यह है कि वह निष्पक्ष हो क्योंकि वह सबका होता है तभी सब उसके हो पाते हैं। वह कभी किसी एक का पक्ष नहीं लेता। अंत में -
भगवान तेरी दुनिया में इंसान नहीं हैं,
मंदिर भी है, मस्जिद भी है, ईमान नहीं है।
आपस में यहाँ फूट है, दिल सबके जुदा हैं,
दौलत जिन्हें मिल जाए, बस वे ही खुदा हैं।
इतना भी नहीं सोचते, हम कौन हैं, क्या हैं,
इंसान को इंसान की पहचान नहीं है।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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