दृष्टि अपनी-अपनी
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
दृष्टि अपनी-अपनी
महानुभावों! एक गुरु के दो शिष्य थे। एक दिन गुरु ने शिष्यों से पूछा कि बताओ, यह जगत तुम्हें कैसा लगता है? उनमें से एक शिष्य ने कहा कि गुरु जी! यह जगत तो बहुत बुरा है। सर्वत्र अंधकार ही दिखाई देता है। जहाँ देखो वहाँ पापों का अंधेरा फैला हुआ है। पुण्य के उजाले का तो जैसे कहीं नाम है ही नहीं। जब दूसरे शिष्य से पूछा कि तुम बताओ, यह जगत तुम्हें कैसा लगता है? तो वह बोला कि गुरुदेव! यह जगत तो भगवान की अनोखी रचना सी प्रतीत होता है। सभी वस्तुएँ अपने स्वरूप से प्रकाशित हो रही हैं। सब अपने स्वभाव में स्थित हैं। क्या कभी आत्मा में चैतन्य-प्रकाश का अभाव हो सकता है?
गुरु ने कहा - बेटा! वह तो चर्म चक्षुओं की दोष-दृष्टि से जगत को देख रहा था और तुम ज्ञानदृष्टि से देख रहे हो। ज्ञानदृष्टि से देखने वाला एक दिन पूर्ण ज्ञानी बन जाएगा।
पाप-पुण्य का, अंधकार-प्रकाश का लेखा-जोखा केवल मनुष्य योनि में ही होता है, पशु, नरक या देवगति में नहीं।
अतः दृष्टि अपनी-अपनी, ख्याल अपना-अपना।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
Comments
Post a Comment