विद्या पढ़े सो राज करे
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
विद्या पढ़े सो राज करे
विद्या जीवन में उल्लास का, प्रकाश का, अलंकार का और योग्यता के कारण सम्मान का माध्यम बनती है। इसलिए विद्यावान पुरुष अपने जीवन को स्वर्ग में परिवर्तित कर सकता है।
मनुष्य और पशु में भेद-रेखा इस कारण है कि मनुष्य में विद्या के कारण चिन्तन मनन की शक्ति प्रखर हो जाती है।
विद्या का सूर्य जब जीवन में उदित होता है तब पाप एवं दोषों की कालिमा नष्ट हो जाती है।
विद्या से विनय और विनय से पात्रता बढ़ती है। जहाँ पात्रता है, वहाँ धन और धर्म की सुरक्षा होती है।
चन्द्रपुर नगर में एक ब्राह्मण के चार पुत्र थे। उसने बाल्यावस्था से ही चारों को विद्या अध्ययन कराना प्रारंभ किया। उसके तीनों बड़े पुत्रों को पढ़ने में गहरी रुचि थी और सबसे छोटा पुत्र चंचल बुद्धि के कारण पढ़ने में मन नहीं लगाता था। ब्राह्मण ने उसे विद्या की महत्ता एवं उसके लाभ समझाए पर वह नहीं माना।
धीरे-धीरे समय के साथ अपने प्रबल पुरुषार्थ द्वारा बड़ा पुत्र आयुर्वेद में, दूसरा पुत्र धर्मशास्त्र में और तीसरा पुत्र नीतिशास्त्र में पारंगत हो गया। दुर्भाग्य से छोटा पुत्र अनपढ़ ही बना रहा। उन तीनों मनीषियों ने अपने-अपने विषय के अनुसार एक-एक महाग्रन्थ की रचना की। हर ग्रन्थ में एक-एक लाख श्लोक थे। हर श्लोक विद्वत्ता से परिपूर्ण था। शब्द-अलंकार एवं भाव-अलंकार की सुन्दर अभिव्यक्ति होने से श्लोक का हर चरण बड़ा आकर्षक था। एक दिन तीनों पण्डित जितशत्रु राजा की सभा में पहुँचे और बोले - ‘‘राजन्! हमने आपकी कृपा से अपने-अपने विषय का एक-एक ग्रन्थ लिखा है। हम उसे आपको सुनाना चाहते हैं।“
राजा ने ग्रंथों को देखते हुए पूछा - ‘‘आपके द्वारा रचित ग्रंथ काफ़ी बड़े प्रतीत हो रहे हैं, उसमें कितने श्लोक हैं?’’ पण्डितों ने कहा - ‘‘राजन्! प्रत्येक ग्रंथ में एक-एक लाख श्लोक हैं।’’
राजा बोला - ‘‘धन्य है आपकी बुद्धि की विलक्षणता और धन्य है आपका प्रखर पाण्डित्य। मैं आपका तहेदिल से सम्मान करता हूँ। एक-एक विषय पर आपने एक-एक लाख श्लोक लिखे हैं किन्तु राजकार्य का भार अधिक होने से इतना विस्तृत ग्रंथ सुनने के लिए मेरे पास अवकाश कहाँ है? अतः आप इन ग्रंथों को संक्षिप्त कर दीजिए। फिर कुछ समय निकालकर सुनने का प्रयास करूँगा।’’
पण्डितों ने कहा - ‘‘राजन्! आपका कथन यथार्थ है क्योंकि आपके कन्धो पर राजकाज को सुचारू रूप से संचालित करने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। अतः हम आपके लिए हर ग्रंथ का समावेश पच्चीस-पच्चीस हजार श्लोकों में कर देते हैं।“
राजा ने कहा - ‘‘पण्डितजी! ये भी बहुत ज्यादा हैं।’’ पण्डितों ने कहा - ‘‘अच्छा राजन! एक हजार श्लोकों में लिख देते हैं।’’
राजा ने मृदु स्वर में कहा - ‘‘पण्डितजी! इतना सुनने के लिए भी लम्बा समय चाहिए। वह समय मेरे पास कहाँ?“
आखिर पण्डितजी हजार से सौ श्लोक पर आए फिर दस पर आए और अन्ततः एक श्लोक पर आ गए।’’
राजा ने कहा - ‘‘पण्डित जी! यदि इसका और भी संक्षेप हो सकता है तो कीजिए।“ तब तीनों पण्डित राजा की उत्कृष्ट जिज्ञासा देखकर उन्हें एक-एक चरण सुनाने के लिए तैयार हो गए।
सबसे पहले आयुर्वेद के पण्डित ने कहा - ‘‘जीर्णे भोजनमात्रेय!’’ आयुर्वेद शास्त्रों में आत्रेय ऋषि का मत बड़ा प्रमाणभूत माना जाता है। वे कहते हैं कि पहले का भोजन पच जाने के बाद ही अगला भोजन करना चाहिए।
धर्मशास्त्र के पण्डित ने कहा - ‘‘कपिल! प्राणिनां दया।“ कपिल ऋषि कहते हैं - दया से बढ़कर और कोई धर्म नहीं है।
नीतिशास्त्र के पण्डित ने कहा - ‘‘बृहस्पति-रन्धविश्वासः।’’ बृहस्पति ने नीति के विषय में लिखा है कि जीवन में सफल होना है तो किसी पर अंधविश्वास नहीं रखना।
ग्रंथों का संक्षिप्तिकरण सुनकर राजा प्रसन्न एवं प्रभावित हुए और उनका स्वागत करते हुए बोले - ‘‘हे विद्वानों! आपकी प्रखर बुद्धि एवं विद्या के सामने मेरा मस्तक अवनत है। मैं आपकी बुद्धि-कुशलता से प्राप्त इन सार-सूत्र से अनुगृहित हूँ। मैं आप तीनों को एक-एक लाख मोहरें ईनाम में देता हूँ।’’
इस तरह वे तीनों पण्डित सम्मानित होकर बहुत प्रसन्न हुए और अपने घर चले गये। जब तीनों हँसी-खुशी घर लौटे तब पिताजी की आँखों में हर्ष के अश्रु थे। वे सोच रहे थे कि विद्या-धन कितना श्रेष्ठ धन है। उसे न कोई चोर चुरा सकता और न ही वह कभी घटता है। विद्या से विनय और विनय से पात्रता आती है। जहाँ पात्रता है वहाँ कभी धन की कमी हो ही नहीं सकती। अपने जीवन में ऐसे समय को प्रत्यक्ष देखकर उनका हृदय गदगद हो रहा था। तीनों को बधाई एवं आशीर्वाद देते हुए अपने छोटे पुत्र से कहा - देखा, बेटा! मैं तुझे बचपन से ही कहता था -
‘‘विद्या पढ़े, सो राज करे।’’
पर तूने मेरी बात न सुनी। वरना आज तू भी विद्यावान होता तो इसी प्रकार राज करता।
अब छोटे पुत्र को विद्या का महत्त्व समझ में आ गया था।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
Comments
Post a Comment