पुण्यहीन के उलटे दाँव
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
पुण्यहीन के उलटे दाँव
प्रत्येक जीवन की सफलता का आधार पुरुषार्थ के साथ पुण्य से भी जुड़ा हुआ है। पुण्य जब क्षीण होता है तब पुरुषार्थ के परिणाम भी विपरीत नजर आते है।
ज्ञानियों ने पुण्य को नौका कहा है जिसमें बैठकर संसार रूपी सागर से किनारा पाया जा सकता है।
पुण्य उपार्जन करने के लिए कुछ दुःख झेलने भी पड़े तो झेलें। जैसे सुख पाने की इच्छा से झेले जाने वाले कष्ट दुःख को मिटाते हैं, वैसे ही सुकृत के लिए भोगे जाने वाले कष्ट सुख, सद्गति व परमगति को निश्चित रूप से प्राप्त कराते हैं।
जो पुण्यहीन है वह चारों ओर से विपत्ति के दलदल में इस कदर फँस जाता है कि औषधि भी उसके लिए जहर बन जाती है। यदि वह किसी का भला भी करता है तो भी उसे दोषी समझा जाता है और उसे बिना अपराध के फाँसी की सजा मिलती है।
एक गाँव में पुण्यहीन व्यक्ति रहता था। जिसने पूर्वजन्म में शुभ-कार्य नहीं किए हों वह पुण्यहीन कहलाता है। पुण्यहीन हर कदम पर कैसे ठोकर खाता है, यह इस कहानी से स्पष्ट होगा।
उस पुण्यहीन के पास खेत था पर बैल नहीं थे। पुण्यहीन अपने मित्र के पास गया और हल जोतने के लिए शाम तक का समय लेकर बैल माँग लाया। जब उसका खेत जुत गया तब वह मित्र को बैल वापस करने आया। उस समय मित्र अपने घर में आँगन के सामने बैठा भोजन कर रहा था। पुण्यहीन ने अपने मित्र के सामने बैलों को आँगन के बाहर बाँध दिया। उसने सोचा कि मित्र ने मुझे बैल बाँधते हुए देख लिया है अतः मित्र को बिना कुछ कहे अपने घर चला गया।
मित्र के बैल उसी रात्रि में चोरी हो गए। तब वह पुण्यहीन के पास पहुँचा और बोला - ‘‘मित्र! मेरे बैल मुझे वापिस दे दो।’’ पुण्यहीन ने कहा - ‘‘मैं तुम्हारे देखते-देखते तुम्हारे आँगन के बाहर बैलों को बाँध आया था।’’
उसके मित्र ने बिगड़ते हुए कहा - ‘‘तूने मुझे सौंपे ही कहाँ थे? यदि तू मेरे हाथ में सौंपता तो मैं मानता। अब तुझे ही मेरे बैल देने पड़ेंगे।’’
पुण्यहीन बड़े चक्कर में फँस गया। उसके मित्र ने किसी मूल्य पर भी उसे नहीं छोड़ा। मित्र उसे राजा के पास लेकर चल दिया। जब वे दोनों राजा के पास जा रहे थे तब सामने से एक घोड़ा दौड़ता हुआ आ रहा था और उसके पीछे घोड़े वाला भाग रहा था। इन दोनों आदमियों को आते देख घोड़े वाले ने जोर से आवाज दी - ‘‘अरे भाई! जरा इस घोड़े को रोकना।’’
पुण्यहीन के पास लाठी थी। उसने घोड़े को रोकने के लिए लाठी मारी। होनहार की बात! लाठी के प्रहार से घोड़ा मर गया। घोड़े वाले ने पुण्यहीन को पकड़ लिया और बोला - ‘‘तूने मेरे घोड़े को मार दिया है। चल, मैं तुझे राजा के पास ले चलता हूँ। चाहे तू कहीं से भी दे किन्तु मेरा घोड़ा मुझे चाहिए।’’
पुण्यहीन दोनों ओर से घिर गया। दोनों व्यक्ति उसे राजा के पास ले जा रहे थे। राजा का नगर दूरी पर था। चलते-चलते शाम हो गई अतः वे तीनों एक वट वृक्ष के नीचे ठहर गए। उसी वृक्ष के नीचे कुछ नट भी ठहरे हुए थे। जब रात गहराने लगी तब पुण्यहीन ने विचार किया कि मुझ पर दो अभियोग हैं। एक तो बैल की चोरी और दूसरा घोड़े की हत्या। राजा बड़े न्यायप्रिय और कठोर है, वे मुझे निश्चित ही प्राण-दण्ड देंगे। इससे तो अच्छा है कि मैं स्वयं फाँसी लगाकर यहीं मर जाऊँ।
इन सब बातों पर विचारकर पुण्यहीन पेड़ पर चढ़ गया और अपनी जीर्ण-शीर्ण धोती का फन्दा बनाकर पेड़ से लटक गया। धोती का कपड़ा पुराना होने से फन्दा टूट गया और पुण्यहीन एक वृद्ध नट पर गिर पड़ा और उस नट की तत्काल मृत्यु हो गई।
उस वृद्ध नट के लड़कों ने पुण्यहीन को पकड़ लिया और अपने पिता की हत्या के अपराध में उसे राजा के पास दण्ड दिलाने ले चले। बेचारे पुण्यहीन के प्राणों पर आ बनी अब उस पर तीन अभियोग हो गये थे। अतः उसका बचना नामुमकिन था।
यथासमय चारों व्यक्ति राजा के पास पहुँचे। राजा ने तीनों की बातें क्रम से सुनी और पुण्यहीन से भी सारी बातें पूछी।
पुण्यहीन ने कहा - ‘‘राजन्! भाग्यदोष के कारण मेरे अपराध सिद्ध हो रहे हैं पर वास्तव में मैं अपराधी नहीं हूँ। आज मुझे बाल्यावस्था में सुने गए मेरी दादी के वचन याद आ रहे हैं।
‘‘पुण्यहीन के उलटे दाँव’’ जो पुण्यहीन होगा, वह गलत नहीं होते हुए भी हर स्थान पर गलत ही सिद्ध होता है।
यह सुनकर राजा ने सब के नुकसान की राजकोष से भरपाई की और पुण्यहीन को धर्म करके पुण्य कमाने की सलाह दी।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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