प्रेम और वात्सल्य

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

प्रेम और वात्सल्य

बन्धुओं! प्रेम जीवन का महामंत्र है। प्रेम प्राणियों के आंतरिक संबंधों को जोड़ने वाली कड़ी है। प्रेम अमृत है, वासना ज़हर है। प्रेम मुक्ति है, वासना मृत्यु है। प्रेम स्वतंत्र है, वासना परतंत्र है। प्रेम में तृप्ति है, संतोष है, समर्पण है और वासना में अतृप्ति है, असंतोष है, स्वार्थ है। प्रेम वासना मूलक नहीं, भावना मूलक है। 

मोह विहीन प्रेम ही परमात्म-दर्शन का माध्यम है। प्रेम की पराकाष्ठा प्रार्थना में प्रकट होती है और प्रार्थना जीवन की एक सुखद स्मृति है। प्रार्थना, प्रेम और वात्सल्य में बहुत अन्तर है। प्रार्थना अपने से बड़ों से की जाती है, प्रार्थना भक्त करता है परमात्मा से, प्रार्थना भक्त और भगवान के बीच में होती है और प्रेम दो समान व्यक्तियों के बीच में होता है जो उम्र में या विचारों में समान हों। यह दोस्ती के रूप में या पति-पत्नी के बीच में हो सकता है तथा वात्सल्य की अमृतधारा अपने से छोटों की ओर बहती है जैसे माँ और बेटे के बीच में। 

वात्सल्य का अर्थ है देना और सिर्फ देना। एक छोटा बच्चा बदले में माँ को कुछ नहीं दे सकता। उसे तो यह भी बोध नहीं होता कि उसे कोई कुछ दे भी रहा है। वात्सल्य में कोई स्वार्थ नहीं होता और न कोई आकांक्षा  होती है। 

महावीर स्वामी ने प्रेम के स्थान पर वात्सल्य शब्द का प्रयोग किया है, जैसे गाय और बछड़े का। वे बहुत ज्ञानवान थे। उन्हें मालूम था कि तुम प्रेम के नाम पर वासना में लिप्त हो जाओगे। शारीरिक संतुष्टि को ही प्रेम समझने लगोगे इसलिए वात्सल्य शब्द चुना। माँ का प्रेम पवित्र, स्वार्थ-रहित और वासना-विहीन, स्वाभाविक प्रेम होता है परन्तु आज का मानव किसी से स्वाभाविक प्रेम नहीं तिर्यंच-वत् प्रेम करता है। यही तो उस की पशुता का प्रतीक है क्योंकि पशु तो पशु से ही प्रेम करेगा। 

मेरे कहने का यह अर्थ नहीं है कि तुम कुत्ते को डंडा मारो, मैं तो यह कहता हूँ कि मनुष्य मनुष्यता को डंडा न मारे। मनुष्यता को मत लजाओ। तुम कुत्ते को लेकर तो कार में घूमो और तुम्हारा भाई भूखा-प्यासा बैठा है या संकट में है तो उसकी फिक्र न करो। यह तो मनुष्यता के नाम पर कलंक ही है। कुत्ते के बच्चे को सुबह शाम दूध पिलाओ और भाई का बच्चा भूख के मारे तड़प रहा है तो उसे सुनकर नज़र अंदाज कर दो। यह सब क्या है? यह मनुष्यता है या पशुता। यह तो मनुष्यता का सरासर अपमान है।

बन्धुओं! मैं तो आपसे केवल इतना ही कहना चाहता हूँ कि यदि आप मनुष्य हैं तो मानवता का परिचय दें। मानवता के नाते प्राणी-मात्र पर दया-अनुकम्पा की दृष्टि रखते हुए हर मनुष्य मानव-धर्म को अपनाए। इसी में कल्याण है और शान्तिसुख का उद्भाव है। आपका समय हो चुका है। एक मुक्तक सुना कर विराम लेते हैं -

मैं साधुओं से आलाप भी कर लिया करता हूँ,

मंदिर में बैठ कर जाप भी कर लिया करता हूँ।

इंसान से भगवान न बन जाऊँ कहीं,

यह सोच कर कुछ पाप भी कर लिया करता हूँ।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

Comments

Popular posts from this blog

स्वतंत्रता दिवस

जीवन में गति है पर दिशा नहीं

प्रभु को प्राप्त करना है