पूत के पाँव पालने में

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

पूत के पाँव पालने में

जैसे बीज में वृक्ष छिपा होता है वैसे ही बाल-जीवन के उत्तम लक्षणों में महानता छिपी होती है। महापुरुषों के लक्षण उनकी बाल्यावस्था में दृष्टिगोचर हो जाते हैं। संस्कार और आचरण में गहरा सम्बन्ध है। पूर्व जन्म के अच्छे और बुरे संस्कार ही वर्तमान जीवन की बुनियाद बनते हैं।

बच्चों के मन में बचपन से ही शुभ संस्कारों को ग्रहण करने के प्रति दृढ़ विश्वास होना चाहिए। माता-पिता का यह प्रथम उत्तरदायित्व बनता है कि वे अपने समुचित व श्रेष्ठ आचरण से बच्चों के मन में अच्छे संस्कारों का बीजारोपण करें और उनके उन्नत जीवन का निर्माण करें।

बाल्यावस्था में ही दृढ़ निश्चय, जागरूकता, उदारता, स्पष्टवादिता आदि जीवन के मूलभूत सिद्धांतों और गुणों का प्रादुर्भाव हो जाए, तो व्यक्ति के जीवन में श्रेष्ठ आचरण परिलक्षित होने लगता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन के बाल्यावस्था की एक घटना है। अब्राहिम लिंकन का जन्म एक बहुत गरीब परिवार में हुआ था। उन्हें अपने घर में दो समय का भरपेट भोजन भी नसीब नहीं होता था किन्तु सत्संस्कारों की जीवन में कमी नहीं थी। उन्हें पुस्तक पढ़ने का बहुत शौक था। अपने घर की आर्थिक स्थिति की विवशता के कारण नई पुस्तकें खरीद कर पढ़ना उनके लिये सम्भव नहीं था। अतः कई बार वे अच्छी और प्रेरणादायक पुस्तकें इधर-उधर से मांग कर भी पढ़ लिया करते थे।

एक दिन अब्राहिम लिंकन किसी परिचित सज्जन से पुस्तक पढ़ने के लिये मांगने आए। पुस्तक देते हुए उस सज्जन ने कहा - ‘‘देखो! तुम्हारा शौक देखकर मैं तुम्हें पुस्तक पढ़ने के लिये दे रहा हूँ किन्तु इसे खराब मत करना और पढ़कर शीघ्र लौटा देना। आज तक मैंने जिनको भी पुस्तक पढ़ने को दी है, वह कभी भी सुरक्षित नहीं लौटी। कोई उस में से पन्ने फाड़ लेता है तो कोई पन्नों को तोड़-मरोड़कर उसका बुरा हाल कर देता है। मैं पुस्तक प्रेमी हूँ। अतः तुम्हें बार-बार यही बात कहूँगा कि पुस्तक को पढ़ना अवश्य परन्तु वह खराब न हो, इस बात का पूरा ख्याल रखना।’’

अब्राहिम ने उस सज्जन को बड़े इत्मीनान के साथ आश्वस्त किया और पुस्तक लेकर अपने घर लौट आए। दिन के समय लिंकन के पास पुस्तक पढ़ने का वक्त नहीं था। स्कूल के अतिरिक्त छोटा-मोटा काम करने में दिन बीत जाता था।

रात्रि के समय वे बड़ी लगन से पुस्तकें पढ़ते थे। उनकी स्थिति इतनी नाजुक थी कि पुस्तकें पढ़ने के लिए घर में लालटेन भी नहीं थी। वे अक्सर सड़क की लाईट में पुस्तकें पढ़ा करते थे। उन दिनों शीतकाल का मौसम था, भयंकर कड़कड़ाती सर्दी में रात्रि के समय सड़क की लाईट में पुस्तक पढ़ना सम्भव नहीं था। अतः वे उस दिन रात भर अंगीठी जलाकर सर्दी से बचते रहे और उसके प्रकाश में पुस्तक पढ़ते रहे।

किताब पढ़ते-पढ़ते जब उन्हें नींद आने लगी तब पास की खिड़की में पुस्तक रखकर वे सो गए। संयोग की बात उस रात खूब बरसात हुई। वर्षा की कुछ बौछारें पुस्तक पर पड़ने से वह खराब हो गई। अब्राहिम लिंकन जब सुबह उठे तो पुस्तक की ऐसी दशा देखकर बहुत दुःखी हुए। वे स्वयं भी पुस्तक-प्रेमी होने से उसके मूल्य को समझते थे। पुस्तक को सही हालत में न लौटाने का दुःख अब उन्हें सताने लगा। इस कारण उनकी आँखें में आँसू निकल पड़े। वे सोचने लगे कि मेरी लापरवाही के कारण ही ऐसा हुआ है। पास में इतने पैसे भी नहीं जो नई किताब खरीदकर उस सज्जन को दी जा सके।

दुःखी मन से आँसू बहाते हुए अब्राहिम भीगी हुई पुस्तक लेकर उस सज्जन के पास पहुँचे। नीची दृष्टि कर लज्जित होकर वे बोले - ‘‘श्रीमान्! मुझे अत्यन्त दुःख है कि मैं आपकी पुस्तक समय पर तो ले आया हूँ किन्तु उसे सही हालत में नहीं ला सका। पुस्तक का मूल्य चुकाने लायक पैसे मेरे पास नहीं है। फिर भी मैं पुस्तक का हर्जाना भरने के लिए तैयार हूँ।’’

उस सज्जन ने महसूस किया कि अब्राहिम अपनी सारी बात बहुत सहजता और ईमानदारी से कह रहा है। स्वयं की गलती को छिपाने के लिये इसने कोई बहाना नहीं बनाया। अब्राहिम लिंकन की सरलता और सत्यता से वे बहुत प्रभावित हुए और बोले - ‘‘ठीक है, कोई बात नहीं, अब तुम जा सकते हो।’’

यह सुनकर बालक लिंकन ने कहा - ‘‘श्रीमान्! अगर मैं इस हानि को पूरा किये बगैर चला गया तो मेरा मन सदा दुःखी रहेगा। आपने मुझे माफ कर दिया पर मैं अपने आप को जिन्दगी भर माफ नहीं कर सकूँगा। इसलिए मैं चाहता हूँ कि पुस्तक का मूल्य चुका दूँ।’’ वे सज्जन आश्चर्यचकित होकर बालक का मुख निहारने लगे।

लिंकन ने अपना दृढ़ निश्चय बताते हुए आगे कहा - ‘‘मैं आपके खेत पर तीन दिन तक काम करूँगा और मिलने वाली मजदूरी से नई पुस्तक खरीद कर लाऊँगा। क्या आप मुझे अपने खेत पर काम करने की इजाजत देंगे?’’

उस सज्जन ने लिंकन को बहुत समझाया कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं। परन्तु वह नहीं माना। अन्त में उन्हें बालक अब्राहिम की बात माननी ही पड़ी। लिंकन ने तीन दिन तक उनके खेत पर काम किया और प्राप्त मजदूरी से नई पुस्तक खरीद कर लाए।

पुस्तक लेकर उस सज्जन ने कहा कि ‘‘पूत के पाँव पालने में’’ इस कहावत के अनुसार एक दिन तुम जरूर बड़े आदमी बनोगे। यही बालक आगे जाकर अमेरिका का राष्ट्रपति बना।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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