पाप

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

पाप

हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह

पुत्र - पिताजी, लोग कहते हैं कि लोभ पाप का बाप है, तो यह लोभ सबसे बड़ा पाप होता होगा?

पिता - नहीं बेटा, सबसे बड़ा पाप तो मिथ्यात्व है, जिसके वश होकर जीव घोर पाप करता है।

पुत्र - पाँच पापों में तो इसका नाम नहीं है।

पिता - ठीक है बेटा। लोभ का नाम भी पापों में नहीं है, किन्तु उसके वश होकर लोग पाप करते हैं इसीलिए तो उसे पाप का बाप कहा जाता है। उसी प्रकार मिथ्यात्व तो ऐसा भयंकर पाप है, जिसके छूटे बिना संसार-भ्रमण छूटता ही नहीं।

पुत्र - ऐसा क्यों?

पिता - उल्टी मान्यता का नाम ही तो मिथ्यात्व है? जब तक मान्यता ही उल्टी रहेगी तब तक जीव पाप कैसे छोड़ेगा?

पुत्र - किसी जीव को सताना, मारना, उसका दिल दुखाना ही हिंसा है न?

पिता - हां, दुनिया तो मात्र इसी को हिंसा कहती है, पर अपनी आत्मा में जो मोह, राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं, वे भी हिंसा हैं, इसकी ख़बर उसे नहीं है।

पुत्र - ऐं! तो फिर गुस्सा करना और लोभ करना आदि भी हिंसा होगी?

पिता - सभी कषाय हिंसा का कारण हैं। कषाय अर्थात् राग-द्वेष और मोह को ही तो भाव हिंसा कहते हैं। दूसरों को सताना-मारना आदि तो द्रव्य हिंसा है।

पुत्र - जैसा देखा, जाना और सुना हो वैसा ही न कहना झूठ है?

पिता - जैसा देखा, जाना और सुना हो, वैसा ही न कह कर अन्यथा कहना तो झूठ है ही, साथ ही जब हम किसी बात को सही समझेंगे नहीं, तब तक हमारा कहना सही कैसे होगा?

पुत्र - जैसा देखा, जाना और सुना, वैसा कह दिया। बस छुट्टी।

पिता - नहीं, हमने किसी अज्ञानी से सुन लिया कि हिंसा में धर्म होता है, तो क्या हिंसा में धर्म मान लेना सत्य हो जाएगा?

पुत्र - वाह। हिंसा में धर्म बताना सत्य कैसे होगा?

पिता - इसलिए तो कहते हैं कि सत्य बोलने से पहले सत्य जानना आवश्यक है।

पुत्र - किसी दूसरे की वस्तु को चुरा लेना ही चोरी है?

पिता - हाँ! किसी की पड़ी हुई वस्तु, भूली हुई, रखी हुई, वस्तु को बिना उसकी आज्ञा उठा लेना या उठाकर किसी को दे देना तो चोरी है ही, किन्तु यदि परवस्तु का ग्रहण न भी हो और ग्रहण करने का भाव ही हो, तो वह भाव भी चोरी है।

पुत्र - ठीक है, पर कुशील क्या है? लोग कहते हैं कि पराई माँ बहिन को बुरी निगाह से देखना कुशील है। बुरी निगाह क्या होती है?

पिता - विषय-वासना ही तो बुरी निगाहें हैं। गन्दे विचार, गंदी पुस्तकें पढ़ना और गंदे दृश्य देखना भी कुशील कहलाता है।

पुत्र - परिग्रह क्या है?

पिता - धन दौलत आदि का संचय एवं उनके प्रति जोड़ने एवं ममत्व का भाव; ये मेरा है - ऐसा अपनापन परिग्रह कहलाता है।

पुत्र - पापों से बचने के लिए हमें क्या करना चाहिए?

पिता - मिथ्यात्व और कषाय को छोड़ना चाहिए क्योंकि सब पापों की जड़ कषाय और मिथ्यात्व है। पापों से जीव का पतन होता है। भले-बुरे की पहचान नहीं रहती। अतः जो बुरे कार्य हैं उनसे हमें बचना चाहिए।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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