नाम बड़े और दर्शन छोटे

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

नाम बड़े और दर्शन छोटे

नाम से कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, नाम की महत्ता काम पर आधारित है। जब नाम के अनुसार गुण नहीं होते, तब कहा जाता है - ‘‘नाम बड़े और दर्शन छोटे।’’

भगवान महावीर ने कहा है कि नाम के लिए कोई कार्य मत करना क्योंकि छःह खण्ड के अधिपति चक्रवर्ती सम्राट का नाम भी इस दुनिया में अमर नहीं रहा।

इस संसार में ‘अमीरचन्द’ नामधारी निर्धन देखे गये हैं और ‘यशपाल’ भी बदनामी से कलंकित हो जाते हैं। नाम में रखा ही क्या है? ‘चमेली’ नाम रखने मात्र से जीवन सुगंधित नहीं बन सकता। ‘गुलाब’ के पुष्प को आप किसी भी नाम से सम्बोधित कीजिए पर उसकी सुगन्ध में अंतर नहीं आएगा।

एक युवक का नाम उसके माता-पिता ने ‘पापक’ रख दिया था। जब वह जानने लगा कि पाप बुरी चीज है, पाप दुःख देता है अतः पाप नहीं करना चाहिए, पाप का नाम मात्र भी अशुभ होता है, तब से वह युवक अपने इस ‘पापक’ नाम से खिन्न रहने लगा। वह इस बात से बहुत दुःखी रहता था कि लोग ‘‘पापक’’ नाम सुनकर उसकी ओर उपेक्षा से, भय से और घृणा से देखते हैं। इतना ही नहीं उससे दूर भागना चाहते हैं, ऐसी स्थिति में उसके मन में बार-बार यही बात आती थी कि यह नाम बदल लेना चाहिए।

वह पापक सीधा-सादा धार्मिक अभिरुचि का व्यक्ति था। किसी का बुरा नहीं करता था फिर भी लोग उसके नाम के कारण उसकी छाया से भी बचना चाहते थे। एक दिन वह दुःखी होकर अपने गुरु के पास पहुँचा। उसे उदास तथा चिन्तित देखकर गुरु ने पूछा - ‘‘वत्स। आज इतने दुःखी क्यों दिखाई दे रहे हो? किसी से कोई झगड़ा हो गया या शरीर अस्वस्थ है?’’

पापक ने निराशा भरे स्वर में कहा - ‘‘गुरुदेव! मेरा नाम बदल दीजिए। ‘पापक’ भी कोई नाम है? जिसे सुनते ही लोग घृणा करते है। अब मुझे स्वयं भी इस नाम से लज्जा आने लगी है।’’

गुरु ने पापक की मनः स्थिति देखकर सोचा कि इसे शब्दों से नहीं प्रयोगात्मक ढंग से समझाना होगा। अतः उन्होंने गंभीर स्वर में कहा - ‘‘वत्स! यदि तुम अपना नाम बदलना चाहते हो तो इसमें इतनी चिंता और दुःख की भला क्या बात है? मैं तुम्हारा नाम अवश्य बदल दूँगा। कोई भी नया कार्य करना हो तो उसके लिए शर्त यह है कि मन प्रसन्न होना चाहिए। अतः मेरी आज्ञा है कि अभी तुम दो-चार दिन के लिए घूम-फिर कर आ जाओ ताकि तुम्हारा मन स्वस्थ हो जाए।’’ गुरु से आश्वासन प्राप्त कर शिष्य का हृदय कुछ हल्का हुआ और वह भ्रमण करने निकल पड़ा।

अनेक दृश्य और प्रकृति की हरियाली निहारते हुए वह क्रमशः आगे बढ़ने लगा। चलते-चलते उसने मार्ग में देखा कि कुछ लोग एक शव को श्मशान भूमि की ओर ले जा रहे हैं। उसने सहानुभूतिपूर्वक पूछा - ‘‘भाईयों! कौन मर गया?’’ लोगों ने बताया - ‘‘आज सुबह सेठ ‘अमर चन्द’ जी का अचानक देहावसान हो गया। वे बहुत ही नेक और सज्जन थे।“

यह सुनकर पापक सोचने लगा, ‘अमर चन्द’ मर गया यह कैसी विचित्र बात है! यदि ‘अमर’ मर गया तो उसके नाम की सार्थकता क्या हुई? इसका मतलब इस दुनिया में नाम के अनुसार कार्य का घटित होना जरूरी नहीं है। यह सोचते-सोचते वह आगे बढ़ गया।

आगे चलकर उसने देखा, एक मकान के द्वार पर एक दासी बैठी रो रही है और उसकी मालकिन उसे खूब पीट रही है। गरीब दासी को इस प्रकार बुरी तरह से मारते-पीटते और रोते देखकर पापक को बड़ी दया आ गई। उसने महिला से पूछा - ‘‘बहन! इस बेचारी को क्यों पीट रही हो? यह कौन है?“

उस महिला ने कहा - ‘‘अरे भैया! यह मेरी दासी ‘लक्ष्मी’ है। यह जितनी गरीब है उतनी ही काम चोर भी है। उसे पीटूँ नहीं तो क्या इसकी पूजा करूँ?’’ पापक का मन दासी के ‘लक्ष्मी’ नाम पर अटक गया। जो धन की देवी कहलाती है, वह गरीबी से कितनी अभिशप्त है।

पापक ने सोचा कि फिर वही विचित्र बात! नाम है लक्ष्मी और इतनी निर्धन कि दास-कर्म करने को विवश है। नाम और काम की इस गुत्थी पर विचार करते हुए पापक और आगे बढ़ा। अब उसके मन का बोझ कुछ हल्का हो रहा था। संसार में नाम की क्या महत्ता और लघुता है। यह बात कुछ-कुछ उसे समझ में आ रही थी।

चलते-चलते वह जंगल की ओर निकल गया। वहाँ एक यात्री मिला जो असमंजस की स्थिति में कभी इस पगडण्डी की ओर देखता तो कभी उस पगडण्डी की ओर देखता। उसे देखकर ऐसा लगता था जैसे वह किसी दुविधा में है और निर्णय नहीं कर पा रहा था कि किधर चले? उस यात्री को देखकर पापक के मन में जिज्ञासा जागी कि इसके नाम में भी अवश्य कोई न कोई राज छिपा होना चाहिए।

अतः उसकी स्थिति को देखकर पापक ने उससे पूछा - ‘‘क्यों भाई! किस दुविधा में पड़े हो?’’ उसने कहा - ‘‘भाई! मै बसन्तपुर ग्राम का निवासी हूँ। मेरा नाम ‘पथक’ है, मार्ग भूल गया हूँ और रास्ता खोज नहीं पा रहा हूँ।’’

पापक ने अब सोच-विचार कर निर्णय कर लिया कि वस्तुतः नाम में कुछ नहीं रखा है। इस दुनिया की विचित्रता मैंने आँखों से देख ली। यहाँ ‘अमर’ मर जाता है। ‘लक्ष्मी’ निर्धनता का अभिशाप झेलती है और ‘पथक’ राह भूल जाता है। अब वह सीधा गुरु के पास गया और सारी बात बताकर बोला - ‘‘गुरुजी! मुझे नाम नहीं बदलना। नाम और काम की अनेक विसंगतियाँ मैंने देख ली हैं। अतः नाम बदलने से कोई प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है। मैंने देख लिया, नाम कुछ होता है तथा ‘काम’ ठीक उससे उल्टा होता है। 

सच ही कहा है -

‘नाम बड़े और दर्शन छोटे’


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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