कुछ तुम समझे कुछ हम समझे

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

कुछ तुम समझे कुछ हम समझे

भीतर पैदा होने वाली विचारों की तरंगें सामने वाले को बिना बताए प्रभावित करती हैं। स्वामी विवेकानन्द ने लिखा है - ‘‘विचारों में इतनी शक्ति है, यदि कोई मनुष्य गुफा में साधना करता हुआ अपने उच्च विचारों के साथ मर जाए तो वे विचार कुछ समय पश्चात् गुफा की दीवारें फाड़कर बाहर निकलेंगे और सब जगह छा जाएंगे तथा अंत में सारे मानव-समाज को लाभान्वित कर देंगे।“

अच्छे विचार रखना भीतरी सुन्दरता है अतः अपने शुभ विचारों की रक्षा कीजिए क्योंकि विचार स्वर्ग में सुने जाते हैं।

भोजन के अजीर्ण से, विचारों का अजीर्ण अधिक खतरनाक है। भोजन के अजीर्ण की दवा है पर विचारों का अजीर्ण, आत्मा को पतन की ओर ले जाता है।

मन के विचार भले ही वाणी के द्वारा प्रकट न किए जाए, फिर भी वे दूसरों के हृदय-द्वार को खटखटा देते हैं।

एक बुढ़िया थी। वह प्रतिदिन अपने गाँव से कुछ माल लेकर पास के शहर में बेचने जाया करती थी। एक दिन ऐसा हुआ कि उसका माल मण्डी में खरीदा नहीं गया और ग्राहक की प्रतीक्षा में उसे लौटने में भी विलम्ब हो गया। माल का विक्रय नहीं होने से उसका मन उदास था। माल का बोझ सिर पर रखकर वह थके-हारे कदमों से अपने गाँव की ओर रवाना हुई। तन-मन की अत्यधिक थकान होने से वह मार्ग में बैठ गई।

उसी मार्ग से एक घुड़सवार गुजर रहा था। बुढ़िया ने देखा कि यह नौजवान मेरे ही गाँव का बेटा है तो उसने अधिकारपूर्वक घुड़सवार से कहा - ‘‘बेटे! जरा ठहरो, मेरी बात सुनो।’’ घुड़सवार शीघ्रता से बोला - ‘‘माँ जी! जल्दी-जल्दी बोलो क्या काम है? मुझे अपने गाँव अतिशीघ्रता से पहुँचना है।”

मधुर वाणी में बुढ़िया ने कहा - ‘‘बेटे, जिस गाँव में तुम जा रहे हो, उसी गाँव में मुझे जाना है। मैं माल बेचने सुबह से निकली थी परन्तु दुर्भाग्य से आज माल का विक्रय नहीं हुआ। मैं इसे अपने सिर पर उठाकर चल रही हूँ पर इस बोझ को उठाकर आगे चल नहीं सकती। इसलिए तुम मेरे सामान की गठरी घोड़े पर ले जाओ तो मुझे बहुत राहत मिलेगी। मेरा घर रास्ते में ही पड़ेगा। तुम इसे वहां छोड़ते हुए आगे बढ़ जाना। मैं तुम्हारा उपकार कभी नहीं भूलूँगी।”

यह सुनकर घुड़सवार तुनक-मिजाजी में बोला - ‘‘मैं क्या आपका नौकर हूँ? यदि आप बोझा ढोते-ढोते थक गई हो तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ? मार्ग में यूँ तो आपकी तरह असहाय अनेक बूढ़े लोग मिलते हैं तो मैं किस-किस का सामान ले जाऊँ। मुझ से यह काम नहीं होगा। किसी और को खोज लेना।’’ यों कहता हुआ घुड़सवार आगे बढ़ गया।

कुछ दूरी तय करने पर घुड़सवार के मन में ख्याल पैदा हुआ - अरे, आज सौभाग्य से अच्छा मौका कुदरत ने दिया था, किन्तु नादानी में मैंने इसे गँवा दिया। यदि मैं बुढ़िया की गठरी ले लेता तो उसे हजम करने का अच्छा सुअवसर था। किन्तु मैंने अपनी अकड़ में यह लाभ खो दिया, अब क्या हो सकता है? इस प्रकार वह सोच ही रहा था कि मन के दूसरे कोने से स्वर उभरा - अभी अवसर पूरा हाथ से नहीं निकला। इसे पुनः खींचा जा सकता है। विलम्ब मत कर, इस मौके का लाभ उठा ले। बस! घोड़े की लगाम खींचकर उसे पुनः उसी दिशा में दौड़ा दे और बुढ़िया से गठरी प्राप्त कर ले।

यह विचार जन्मते ही उसने द्रुत गति से घोड़े को उसी दिशा में दौड़ा दिया। घोड़े से नीचे उतरकर बुढ़िया के पास आया।

वह बोला - ‘‘माँ जी! मुझे माफ कर दो। कुछ दूरी तय करने पर मेरे ख्यालों में अचानक परिवर्तन आ गया। मैंने सोचा कि आज मुझसे बड़ी भूल हो गई है। एक वृद्ध माँ को मैंने इस तरह अपनी ऐंठ में जो जवाब दिया, वह अच्छा नहीं किया। इसलिए मैं लौटकर गठरी लेने आया हूँ, मैं इसे आपके घर सुरक्षित रूप से पहुँचा दूँगा।’’

यह सुनकर बुढ़िया मंद-मंद मुस्कुराती हुई बोली - ”बेटे! जो तुझे कह गया वह मुझे भी कह गया। अब समय हाथ से निकल गया है। अब मैं तुम्हें गठरी हर्गिज न दूँगी।’’ घुड़सवार चकित हुआ और बोला - ‘‘माँ जी! आप यह क्या कह रही हो? मैं आपके कथन का रहस्य समझ नहीं पा रहा हूँ।’’

तब बुढ़िया ने स्पष्ट करते हुए कहा - ‘‘सच्चाई यह है कि जिस समय मैंने तुमसे गठरी ले जाने को कहा था उस समय तुम्हारे विचार शुद्ध थे। इसी कारण मुझे भी गठरी देने की सूझी। अब तुम्हारे मस्तिष्क में विकृति उत्पन्न हो गई। विचारों की पवित्रता खत्म हो गई। मन में पाप आ गया और तुमने नीति से अनीति में प्रवेश कर लिया है। इस प्रकार तुम्हारे मन की प्रामाणिकता बदल गई। तुम्हारी विचार तरंगों के दुष्प्रभाव ने बिना कहे मुझे सब कुछ कह दिया।

अतः अब मैं अपना सामान देना नहीं चाहती, स्वयं ही इस बोझ को उठाकर अपने घर जाऊँगी। संक्षेप में, तुम्हारे विचार बदले तो मेरे भी विचार बदल गये।’’

इसलिए मैंने तुम्हें प्रारम्भ में कह दिया ‘‘कुछ तुम समझे कुछ हम समझे।’’

अन्त में बुढ़िया ने उसे चेतावनी देते हुए कहा - बेटे! विचारों का विज्ञान बड़ा अनूठा है। विचार शक्ति का प्रभाव दूसरों पर बहुत जल्दी पड़ता है। जिस व्यक्ति की जैसी विचारधारा होगी सामने वाले पर उसका प्रभाव वैसा ही पड़ेगा। अतः व्यक्ति को अपनी विचारधारा पवित्र रखनी चाहिए। कहा भी है -

कुछ तुम समझे हृदय में,

कुछ हम समझे अद्य।

बुरे विचारों का असर,

मन पर पड़ता सद्य।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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