कर भला होगा भला

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

कर भला होगा भला

भलाई करना मनुष्य का सबसे महत्त्वपूर्ण और सम्मान-प्रदायक कर्तव्य है जो हमारे सुख तथा सौभाग्य की वृद्धि करता है।

‘मेरे सुख में सबका सुख’ इस भावना का त्याग करके ‘सबके सुख में मेरा सुख’ इस भावना से सतत मन को समृद्ध करना चाहिये।

भलाई का फल भलाई के रूप में मिलता है फिर किसी की भलाई करने में हम तत्पर क्यों नहीं होते? जब देने के लिए प्रकृति ने हमें समय, समझ, सामग्री और सामर्थ्य दिया है तो बाँटने में कँजूसी क्यों?

अपनी मानसिक शक्ति को मंगल-कामना में, वाणी की शक्ति को शुभाशीर्वाद एवं सच्ची सलाह देने में, बुद्धि की शक्ति को सही मार्गदर्शन देने में और काया की शक्ति को अभय दान एवं परोपकार में लगा देने में जीवन की सार्थकता है।

‘‘पोथियाँ सारी बाँच कर,

बात निकाली दोय।

सुख दिये सुख होत है,

दुःख दिये दुःख होय।’’

एक गरीब बुढ़िया थी। उसका इकलौता बेटा था। घर में बहुत गरीबी होने से एक दिन बुढ़िया ने बेटे से कहा - ‘‘बेटा! मैंने सुना है, यहाँ से पूर्व दिशा की ओर सौ मील की दूरी पर एक असाधारण योगी रहता है। वह किसी भी प्रश्न का उत्तर देने में समर्थ है। अतः मेरी इच्छा है कि तुम एक बार उनके द्वार पर जाओ और अपनी गरीबी के प्रश्न का उत्तर उनसे लेकर आओ।’’

माँ की बात सुनकर बेटे ने कहा - ‘‘माँ! मुझे आशीर्वाद दो। मैं योगी के पास जाऊँगा और इस प्रश्न का उत्तर लेकर ही आऊँगा।’’ माँ ने पुत्र को खुशी-खुशी विदा किया।

सुबह से शाम तक चलते-चलते जब उसने पच्चीस मील की दूरी तय की तब एक गाँव आया। रात्रि विश्राम हेतु वह एक सेठ की हवेली में ठहरा। सुबह जाने लगा तो सेठानी के पूछने पर उसने अपनी यात्रा का उद्देश्य बताया। यह सुनकर सेठानी बोली - ‘‘मेरे भी एक प्रश्न का उत्तर ले आना। मेरी इकलौती बेटी है जो जन्म से गूंगी है, तुम यह पूछकर आना कि वह कब बोलेगी?’’

वह युवक सेठानी का प्रश्न लेकर आगे बढ़ा। चलते-चलते जंगल में एक संन्यासी मिल गये। उन्होंने जब जाना कि यह युवक महात्मा के पास जा रहा है तब उन्होंने कहा - ‘‘मुझे संन्यास लिए हुए पचास वर्ष हो गए किन्तु अभी तक साधना में स्वाद क्यों नहीं आया? तुम मेरे इस प्रश्न का उत्तर लेकर जरूर आना।’’

वह युवक प्रश्न लेकर आगे चला। एक बगिया में रात्रि विश्राम के लिए ठहरा। माली ने भी अपना एक प्रश्न बताते हुए कहा - ‘‘मेरी बगिया में अनार के पौधों के चारों तरफ कोई भी वृक्ष जड़ क्यों नहीं पकड़ता है, इसका भी उत्तर लेकर आना।’’

दूसरी सुबह युवक वहाँ से चल पड़ा और शाम ढलने से पहले योगी के चरणों में पहुँच गया। बहुत उत्कृष्ट भावों से चरणों में शीश झुकाया और कहा - ‘‘हे योगीराज! बड़ी दूर से मैं कुछ आशा ले कर आया हूँ। आप मेरे प्रश्नों का उत्तर देने की कृपा करें। मुझ गरीब पर अनुग्रह कीजिए।’’

योगी ने अपनी शर्त बताते हुए कहा - ‘‘बच्चा! मैं एक साथ एक व्यक्ति के तीन प्रश्नों के उत्तर दे सकता हूँ।’’

यह सुनकर युवक असमंजस में पड़ गया। मेरे पास चार प्रश्न हैं। सभी प्रश्न पूछने जरूरी हैं। योगीराज तीन प्रश्नों के उत्तर देंगे तो मुझे कोई एक प्रश्न छोड़ना पड़ेगा। वह सोच में पड़ गया कि किसका प्रश्न छोड़ दूँ तो काम चल सकता है। वह सभी का भला चाहता था। अतः उसे सभी के प्रश्न पूछने अनिवार्य लगे। आखिर उसने अपना प्रश्न छोड़ने का निर्णय लिया और उन तीनों के प्रश्नों के उत्तर लेकर वापस चल पड़ा।

चलते-चलते मार्ग में सबसे पहले उसे माली मिला। युवक उसके प्रश्न का उत्तर बताते हुए कहने लगा - ‘‘योगीराज ने कहा है कि इन अनार के पौधों के चारों तरफ मोहरों से भरे हुए स्वर्ण कलश जमीन में दबे हुए हैं। जब तक कलश रहेंगे तब तक कोई भी दूसरा वृक्ष जड़ नहीं पकड़ेगा।’’ माली ने तुरन्त खुदाई की तो उसे वहाँ चार कलश मिल गये।

माली ने युवक का आभार प्रदर्शित करते हुए कहा - ‘‘इसमें से आधे पर तुम्हारा अधिकार है। अतः ये दो कलश तुम स्वीकार कर लो।’’

मोहरों से भरे कलश लेकर युवक आगे बढ़ा तो उसे संन्यासी मिले। युवक ने कहा - ‘‘महात्माजी! आपके प्रश्न का उत्तर यह है कि आपकी जटा में रत्न हैं। जब आपने गृहवास त्यागा तो चार रत्न यह सोचकर छिपा लिये थे कि शायद भविष्य में कभी काम आएँगे। आप जब भी प्रभु-भक्ति में बैठते हैं तो आपका मन जटा में रखे हुए उन रत्नों की सुरक्षा में लगा रहता है। ये रत्न जब तक आपके पास रहेंगे, आपको साधना का स्वाद नहीं आएगा।’’

संन्यासी ने कहा - ‘‘योगीराज की बात सच है। तुम मेरे बड़े उपकारी हो, मैं तुम्हें अभी अपनी जटा से रत्न निकाल कर सौंपता हूँ। मेरा धन्यवाद लो और अपने घर जाओ।’’

युवक उन बहुमूल्य रत्नों को संभालता हुआ आगे बढ़ा। सेठानी के घर पहुँचा और उसके प्रश्न का उत्तर देते हुए बोला - ‘‘योगीराज ने फरमाया है कि आपकी बेटी जब अपने होने वाले पति के दर्शन करेगी तब स्वयं बोल पड़ेगी।’’

इतने में अनायास अतिथि का स्वागत-सत्कार करने जलपान लेकर सेठानी की बेटी ने जैसे ही कमरे में प्रवेश किया और युवक को देखा तो वह बोलने लग गई। सेठानी की खुशी का पारावार नहीं रहा और वह कहने लगी - ‘‘आप ही वह हैं जिसका संकेत महात्मा ने दिया है। अब आप मेरी बेटी से विवाह कर लो।

युवक दूसरे दिन लाखों का धन लेकर सुशील पत्नी के साथ घर पहुँचा। घर में प्रवेश करते ही माँ के चरणों में झुकते हुए बोला - ‘‘माँ! मैं उत्तर लेकर आ गया हूँ। आपके आशीर्वाद से लाखों की दौलत मिल गई और मेरा विवाह भी हो गया।’’ उसने अपनी माँ को अथ से इति तक की कहानी कह सुनाई। 

बुढ़िया ने बेटे को गले लगाते हुए कहा - ‘‘कर भला, होगा भला।’’


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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