कल करे सो आज कर
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
कल करे सो आज कर
कल आएगा, यह निश्चित है किन्तु कल हम होंगे यह निश्चित नहीं। अतः करने योग्य कार्य को कल पर टालना सबसे बड़ी नादानी है। मन जिस कार्य को महत्व देता है, उसे वह तत्काल कर लेता है और जिसे वह महत्व नहीं देता, उसे टरकाता रहता है। जब मन कहे कि आज नहीं कल करेंगे, तब स्पष्ट संकेत समझ लेना चाहिये कि यह कार्य कभी नहीं होगा।
बाईबिल में लिखा है ‘‘स्वयं को कल पर आश्वस्त मत कर क्योंकि तुझे नहीं मालूम, आने वाला दिन तेरे लिए क्या लायेगा?’’
बीज से ही निपट लो, वृक्ष से निपटना कठिन है। हर चीज समय के जाते-जाते बड़ी हो जाती है। अतः कल पर मत टालो।
रामायण का प्रसंग है। राजा दशरथ अपने राजपरिवार के साथ आनन्द से दिन व्यतीत कर रहे थे। जिस परिवार में न पुत्र का अभाव हो, न प्यार की कमी हो, वहाँ अमन-चैन हरदम बना रहता है। एक दिन राजा दशरथ राज-सिंहासन पर बैठे हुऐ थे। अचानक उनकी दृष्टि सामने दर्पण में प्रतिबिम्बित अपने मुकुट पर गई। उन्होंने देखा कि मुकुट झुक रहा है। बैठे-बैठे वे गहन चिन्तन में डूब गये।
मुकुट झुकने का अर्थ है - अब सत्ता हाथ से जाने वाली है क्योंकि मुकुट राज गद्दी का प्रतीक है। मुकुट कहता है - सत्ता के लिये जीओ किन्तु अब उम्र कह रही है - सत्य के लिये जीओ। जो दूसरों पर शासन कराए, वह सत्ता है और जो स्वयं पर शासन कराए, वह सत्य है। उन्होंने मन में दृढ़ निश्चय कर लिया। अब मुझे योग्य उत्तराधिकारी को राज्य की बागडोर सौंपकर सत्य की खोज करनी चाहिये।
रात्रि के एकान्त क्षणों में महाराज दशरथ ने अपने मनोगत चिन्तन से महारानी कौशल्या को अवगत कराते हुए कहा - ‘‘देवी! अब वह समय आ गया जब व्यक्ति को जाग जाना चाहिये। उम्र की डोर अगर चार उंगल भी शेष हो तब आदमी संभल जाये तो सारा जीवन सफल किया जा सकता है। मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे उत्तराधिकारी की कोई चिन्ता नहीं। योग्य सुशील और मर्यादा सम्पन्न राम का राज्याभिषेक कर मैं राज्य-भार से निवृत्त होना चाहता हूँ।’’
महारानी कौशल्या ने महाराज की बात का समर्थन करते हुए कहा - ‘‘प्राणनाथ! आपका विचार सर्वोत्तम है, राम का राज्याभिषेक करना ही है किन्तु मैं चाहती हूँ कि ऐसे शुभ कार्य के लिये गुरु वशिष्ठ जी की सलाह ले कर मंगल मुहूर्त में सारे कार्य सफल हों तो राज्य में सुख शान्ति बनी रहेगी।’’
दूसरे दिन सुबह महाराजा दशरथ ने अपनी राज्यसभा में आदर सहित गुरु वशिष्ठ जी को आमंत्रित किया। उन्हें यथायोग्य स्थान पर आसीन कर विनम्र भाव से प्रार्थना के स्वर में राजा दशरथ ने कहा - ‘‘गुरुदेव! मैं राम का राजतिलक करना चाहता हूँ। आप इसके लिये शुभ दिन, मंगल मुहूर्त बताने की कृपा कीजिये।’’
गुरु वशिष्ठ ज्योतिष शास्त्र में पारगंत अवश्य थे किन्तु वे समय की बलवत्ता और महत्ता को विशेष महत्व दिया करते थे। ‘‘शुभस्यशीघ्रम्’’ यह उनके जीवन का प्रथम सूत्र था। जो शुभ कार्य करने में देरी करता है उससे वह शुभ कार्य कैसे टल जाता है, उसे कोई नहीं जान पाता।
इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए गुरु वशिष्ठ ने तत्क्षण कहा - ‘‘राजन्। शुभ कार्य के लिये किसी मुहूर्त की जरूरत नहीं होती। आज ही राम का राजतिलक कर दो। मेरा मानना है कि जिस मुहूर्त में राम का राजतिलक होगा वही मुहूर्त शुभ हो जायेगा। मुहूर्त का विधान दुनिया के उन सामान्य जनों के लिये है जो शुभ कार्य के करने में देर कर देते हैं। शुभ विचार में विलम्ब न हो जाये इसके लिये मुहूर्त होते हैं। जो शुभ को शीघ्र कर ले, तत्क्षण कर ले, उसके लिये ज्योतिष शास्त्र के मुहूर्त की जरूरत नहीं होती। अतः राजन् आज और अभी श्री राम का राजतिलक कर दीजिये।’’
यह सुन कर महाराज दशरथ ने कहा - ‘‘गुरुदेव! आपके वचन अक्षरशः सत्य हैं, यथार्थ हैं। मैं भी इसे स्वीकार करता हूँ। लेकिन राजतिलक के लिये मुझे कुछ लौकिक तैयारी भी करनी है। अनेक राजा महाराजाओं को आमन्त्रित करना है। पूर्ण राजकीय विधि से मैं राम का राज्याभिषेक करना चाहता हूँ। इतना आयोजन-संयोजन आज ही जुटाना संभव नहीं है। अतः गुरुदेव! मैं यह शुभ कार्य आज नहीं कल कर लूँगा।’’
यह कह कर दशरथ ने आज का कार्य कल पर टाल दिया था। हालांकि गुरु वशिष्ठ ने उन्हें समझाते हुए कहा था - ‘‘राजन्! कल कभी नहीं आता। कल जब भी हमारे द्वार पर आता है, आज बन कर ही आता है। अतः जो कार्य आज किया जा सकता है उसे कल पर मत टालो।’’
महाराजा दशरथ ने अपने जीवनकाल में बस यही एक भूल की थी कि राम का राज्यभिषेक ‘आज’ न करके ‘कल’ पर टाल दिया था और आगे की घटना सारी दुनिया जानती है। वह ‘कल’ महाराजा दशरथ के सामने कभी नहीं आ सका। कल ने ऐसा धक्का मारा कि वह चौदह वर्ष आगे खिसक गया। वह कल चौदह वर्ष बाद लौट कर आया। तब दशरथ उसे देखने के लिए जीवित नहीं रह सके। इसलिये महर्षि कहते हैं -
‘‘काल करे सो आज कर,
आज करे सो अब।
पल में परलय होएगा,
बहुरि करेगा कब?’’
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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