जीवन एक बोझ नहीं, बोध है
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
जीवन एक बोझ नहीं, बोध है
महानुभावों! प्रायः लोग जीवन में आने वाली कठिनाइयों से डर कर जीवन को बोझ समझने लगते हैं लेकिन जो जीवन के बोध को पहचान लेता है, वह बुद्धत्व को प्राप्त कर लेता है। फिर उसे जीवन बोझ नहीं लगता। बुद्धत्व को प्राप्त करना जीवन की महानतम घटना है। इस उपलब्धि के बिना तो सारा जीवन ही व्यर्थ है। जिन्हें बचपन में ही जीवन का बोध हो जाता है, निःसन्देह वे बड़भागी कहलाते हैं। उनके सौभाग्य की तुलना नहीं की जा सकती।
मुनि कुंदकुंद भगवान, मुनि जिनसेन आदि ऐसे ही सौभाग्यशाली थे। कुछ लोग बचपन में सोए रहते हैं पर जवानी में जाग जाते हैं वे भी सौभाग्यशाली होते हैं। वे महावीर स्वामी की तरह जवानी में भी जाग कर परमात्मा बन सकते हैं। जो लोग न बचपन में जागते और न जवानी में उन्हें जीवन का बोध होता है पर यदि वे बुढ़ापे में जाग जाएं तो भी कम भाग्यशाली नहीं हैं। लेकिन जो न बचपन में, न जवानी में और न बुढ़ापे में जीवन का बोध कर पाते हैं, इन तीनों अवस्थाओं में सोए ही रहते हैं, वे सोए-सोए ही पैदा होते हैं, सोए-सोए ही जीते हैं और सोए-सोए ही दुनिया से कूच कर जाते हैं। ऐसे सोए हुए लोगों के विषय में क्या कहा जाए? यह तो प्रमाद की पराकाष्ठा है। पर याद रखो, तुम्हें सोना नहीं जागना है।
मुनिश्री ने कहा कि जैसे ज़मीन के नीचे पानी छिपा रहता है या पत्थर में प्रभु की प्रतिमा छिपी रहती है, उनकी छवि छिपी रहती है, उसी प्रकार हर आत्मा में परमात्मा की ज्योति छिपी रहती है। जैसे पानी निकालने के लिए हमें ज़मीन को खोदना पड़ता है, प्रतिमा को प्रकट करने के लिए और उनके दर्शन करने के लिए पत्थर को तराशना पड़ता है उसी प्रकार आत्मा में विराजमान परमात्मा के दर्शन करने के लिए मनुष्य को तपस्या व सत्-साधना से गुज़रना पड़ता है।
मनुष्य के हर कार्य के पीछे अभिप्राय और भावना अच्छी हो तो वह कार्य प्रार्थना बन जाता है। एक दुकान पर ग्राहक को देख कर दुकानदार को यही सोचना चाहिए कि भगवान स्वयं चल कर आए हैं मुझे लक्ष्मी प्रदान करने के लिए। इस तरह का चिंतन करने से उसका ग्राहक के प्रति वही व्यवहार होगा जो एक भक्त का भगवान के प्रति होता है। उसका प्रेमपूर्ण व्यवहार उसके लिए पुण्य बढ़ाने का माध्यम बन जाएगा। ग्राहक की जेब भी नहीं कटेगी और वह स्थाई ग्राहक भी बन जाएगा।
घर से बाहर चाहे किसी भी काम से निकलो तो यह सोच कर निकलो कि मैं भगवान के मंदिर की प्रदक्षिणा करने जा रहा हूँ। मंदिर में सिर्फ़ भगवान की पूजा ही नहीं होनी चाहिए बल्कि उसे अपने मन में सेवा के केन्द्र के रूप में मान लेना चाहिए। दुखियों, पीड़ितों की सेवा ही परमात्मा ही सच्ची भक्ति होती है। एक समर्थ इंसान किसी ज़रूरतमंद इंसान के काम आ जाए तो उसका इंसान होना सार्थक है। इसका अर्थ होगा कि वह अपने इंसानियत धर्म का पालन कर रहा है।
मुनि श्री ने प्रतिक्रमण यात्रा और प्रवचन में अन्तर बताते हुए कहा है कि यदि भूला-भटका आदमी घर लौट आए तो वह प्रतिक्रमण है। थके हुए यात्री को विश्राम के लिए वृक्ष की छाया मिल जाए तो यह आनन्द-यात्रा है और भूखे-प्यासे को भोजन-पानी मिल जाए तो यह प्रवचन है। अतः समय रहते जीवन में बोध जगाएं और बुद्धत्व को प्राप्त करें।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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