जब आँखें खुलें तब सवेरा
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
जब आँखें खुलें तब सवेरा
जब कोई आत्मा किसी के वचन से या किसी दुःखद घटना से जागती है तब उसके जीवन में ज्ञान का सवेरा होता है। उठने और जागने में अन्तर होता है। आँखों का खुलना उठना कहलाता है और दृष्टि का खुलना जागना कहलाता है। जब हमारी अन्तर्दृष्टि खुल जाती है, तभी से जीवन में क्रान्ति आती है। उसी क्षण से विचार, आचार और व्यवहार बदल जाता है।
जब तक मानव अपने पापों को असत्य के आवरण में छिपाता रहेगा तब तक उसके जीवन में अंधेरा छाया रहेगा। जिस दिन वह अपनी भूलों को या दोषों को प्रकट करके पश्चाताप करेगा उस दिन से उसके जीवन में प्रकाश फैलेगा।
सम्राट सिकन्दर की महत्वाकांक्षा बहुत बड़ी थी। सारा संसार उसे अत्यधिक छोटा तथा नगण्य-सा प्रतीत होता था। उसकी राज्य-लिप्सा अत्यन्त विस्तीर्ण थी। वह अहर्निश इस प्रकार की योजना गढ़ता रहता था जिससे वह विश्व-विजेता बन जाए। नीयती ने उसकी इस भावना की पूर्ति में सहयोग प्रदान किया। उसका भाग्य उस पर प्रसन्न था। उसने विजय प्रयाण आरम्भ किया और क्रमशः विश्व विजेता होता चला गया। एक बार जंगल में फकीर डायजनिज से उसकी भेंट हो गई। शिष्टाचार-मूलक बातों के अनन्तर फकीर ने सिकन्दर से कोमल शब्दों में पूछा - ‘‘तुम्हारी सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा क्या है?’’
सिकन्दर ने सीधा-सा उत्तर दिया - ‘‘मैं यूनान को जीतना चाहता हूँ।’’ फकीर ने सहज शब्दों में पूछा - ‘‘इसके बाद तुम क्या करोगे?’’ सिकन्दर ने दर्पयुक्त स्वर में कहा - ‘‘उसके बाद मैं समस्त एशिया भू-खण्ड को जीतने की प्रबल इच्छा रखता हूँ।’’
फकीर ने पुनः अपने उसी प्रश्न को दोहराया - ‘‘सिकन्दर! उसके बाद तुम क्या करोगे?’’ सिकन्दर का सीना गर्व से फूल गया। उसने अहं के साथ कहा - ‘‘फिर सारे संसार को जीतना चाहूँगा।’’ फकीर ने पूछा - ‘‘मान लो, सिकन्दर! जब तुम्हारी यह चाह भी पूर्ण हो जाएगी, तब तुम क्या करोगे?’’ अब सिकन्दर की आँखों में चमक आ गई। उसने गर्वीली शब्दावली में कहा - ‘‘फिर मैं जीवन का समग्र आनन्द प्राप्त करूँगा। उस समय मेरे लिए सारे साधन निमिष मात्र में प्रस्तुत हो जाएंगे।’’
फकीर डायजनीज ने निशाने पर तीर मारते हुए कहा - ‘‘सिकन्दर! फिर जीवन के उस आनन्द को इस समय ही क्यों नहीं ले लेते? तुम्हें इस समय कौन रोकता है? व्यर्थ में युद्ध क्यों लड़ रहे हो?’’
सिकन्दर अपने कथन के अनुसार अपने लक्ष्य की ओर बढ़ गया और फकीर डायजनिज भी अपने गंतव्य की ओर चल पड़े। सिकन्दर के मनोमस्तिष्क में एक ही धुन सवार थी, विश्व-विजय के स्वप्न को साकार करना। सुसज्जित और प्रशिक्षित सेना के साथ उसने आगे प्रयाण किया। एशिया के अनेक राज्यों में विजय-पताका फहराता हुआ वह भारत में भी आया। इस प्रदेश में उसने जिस ओर दृष्टि घुमाई उसी ओर के राजसिंहासन हिल उठे। सिकन्दर का उत्साह शतगुणित हो गया। उसका उन्माद आकाश को छूने लगा।
एक दिन वह किसी राजा का अतिथि बना। वह राजा असाधारण था क्योंकि दृष्टि तात्विक एवं सात्विक थी। जब सिकन्दर ने भोजन करने की अभिलाषा व्यक्त की तब कुछ समय बाद रत्नों से जड़ित एक तश्तरी में सोने की एक ईंट उसके सामने रखी गई। उसे देखते ही सिकन्दर की भौंहे तन गई। भावावेश में आकर उसने कहा - ‘‘मेरे साथ यह क्या उपहास हो रहा है? मुझे भोजन में गेहूँ की रोटी चाहिए। उसे शीघ्र लाया जाए।’’
तब राजा ने विनम्रता से उत्तर दिया - ‘‘सिकन्दर महान! गेहूँ की रोटी तो साधारण मनुष्य के लिए होती है जिससे साधारण मनुष्य की भूख शान्त होती है। आप जैसे असाधारण विश्व-विजेता के लिए तो सोने की रोटी खाना शोभास्पद है।’’ सिकन्दर ने पुनः कड़कते हुए स्वर में कहा - ‘‘नहीं राजन्! इसको यहाँ से हटाओ और शीघ्र गेहूँ की रोटी उपस्थित करो।’’
शान्त स्वर में पुनः राजा ने कहा - ‘‘सिकन्दर! क्या गेहूँ की रोटी उस यूनान देश में आराम से नहीं मिलती थी, जो उस देश से इतनी दूर आप विश्व-विजय के लिए निकले हो?’’
यह सुनकर सिकन्दर के अन्तर्नेत्र खुल गए। उसे प्रतीत हुआ कि मैं अपने अहम्-पोषण के लिए महत्वाकांक्षा के जाल में कितना उलझ गया हूँ। मैंने कितने निरीह प्राणियों के प्राण लूटे हैं। इस प्रकार इस छोटे से क्षणभंगुर जीवन में मैंने अपनी आत्मा को कितना बोझिल बनाया। उसका मन पश्चाताप से भर गया। उसी क्षण उसने अपनी सेना को लेकर यूनान जाने का निश्चय कर लिया। चलते-चलते सिकन्दर उसी फकीर के पास जा पहुँचा।
फकीर के चरणों में मन का खेद व्यक्त करते हुए बोला - ‘‘काश! मैं पहले ही आपकी हितकारी शिक्षा को मान लेता तो मुझे इतनी हिंसा करनी नहीं पड़ती। मैंने महत्वाकांक्षा की मृगमरीचिका में अपनी आत्मा पर पाप का बोझ बढ़ा दिया। मैं अपनी जीवन की चादर को अब कैसे साफ़ करूँ? उस चादर पर हिंसा और अहंकार के धब्बे लग गए हैं।’’
जब फकीर डायजनिज ने देखा कि सिकन्दर को सच्चे मन से पश्चाताप हो रहा है तब वे बहुत स्नेहपूर्वक बोले - हाँ सम्राट!
‘‘जब जागो तभी सवेरा।’’
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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