गुण से गुड़ मिलेगा

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

गुण से गुड़ मिलेगा

गुण सर्वत्र अपना आदर करा लेते है क्योंकि एक गुण समस्त दोषों को ढकने की सामर्थ्य रखता है। महान जीवन की शुरुआत एक छोटे से गुण से होती है, जैसे बड़े मकान का प्रवेश द्वार भी छोटा होता है।

सज्जन चाहे कितने ही दूर बैठे हों, उनके गुण उनकी ख्याति फैलाने के लिए स्वयं दूत का कार्य करते हैं। जैसे केवड़े के पुष्प की सुगन्ध सूंघकर भ्रमर स्वयं उसके पास चले आते हैं।

किसी में एक दोष दृष्टिगोचर होते ही मन उसे दोषी ठहराने के लिए तत्पर हो जाता है किन्तु सद्गुण दृष्टिगोचर होने पर मन उसका गुणगान करने के लिए तत्पर नहीं होता।

गुणों की पूजा सर्वत्र होती है, सम्पत्ति की नहीं। जैसे द्वितीया के चन्द्र को सभी नमस्कार करते हैं, पूर्ण चन्द्र को नहीं।

बादशाह अकबर की राजसभा में बहुत बड़े-बड़े विद्वान और गुणवान मंत्री थे। उनमें बीरबल का नाम बहुत मशहूर था। बादशाह अकबर मंत्री बीरबल का सबसे अधिक सम्मान करते थे क्योंकि वह बुद्धिमान तथा हाजिर-जवाब था। बीरबल के गुणों से अन्य समस्त दरबारी ईर्ष्या करते थे। एक दिन किसी कारण से बीरबल सभा में नहीं गए तब उचित मौका देखकर कुछ लोगों ने शिकायत भरे स्वर में कहा - ‘‘जहाँपनाह! आप बीरबल का बहुत सम्मान करते हैं और हमारा कम। बीरबल में ऐसी क्या विशेषता है जो हमारे में नहीं है?’’

अकबर बादशाह ने देखा कि दरबारियों को बीरबल के गुणों के प्रति कितनी ईर्ष्या जागृत हो गई है। कुछ सोचकर बादशाह ने कहा - ‘‘हमारे हर प्रश्न का उत्तर बीरबल बड़ी बुद्धिमानी से देता है। यदि तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दे दो तो मैं तुम्हारा भी उतना ही सम्मान करूँगा।’’ दरबारियों ने उत्साहपूर्वक कहा - ‘‘जहाँपनाह! हम भी आपके प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं।’’

अकबर ने दरबारियों से प्रश्न पूछा - ‘‘दो अबके ले आओ, दो तबके ले आओ और दो ऐसे लाओ जो न अबके हों न तबके।’’ दरबारियों ने सोचा कि लगता है, आज अकबर भाँग पी कर आया है अन्यथा ऐसा अटपटा प्रश्न पूछने का क्या मतलब? भय के कारण सकपकाते हुए दरबारियों ने कहा - ‘‘जहाँपनाह! आपके प्रश्न को हमने ठीक से सुना नहीं अतः आप प्रश्न को दोहरा दीजिए।’’

बादशाह ने कहा - ‘‘एक बार फिर ध्यानपूर्वक सुन लो।’’ यह कहकर उन्होंने प्रश्न दोहरा दिया। दरबारियों के पल्ले अब भी कुछ नहीं पड़ा था। यह बादशाह ने भाँप लिया था। इतने में बीरबल आ गए। बादशाह को सलाम करने के बाद बीरबल ने कहा - ‘‘परवरदिगार! ये सब चिन्तित क्यों हैं?’’

अकबर ने कहा - ”बीरबल! ये लोग तुमसे ईर्ष्या करते हैं, कहते हैं कि जिस प्रकार बीरबल हर प्रश्न का उत्तर देता है उसी प्रकार हम भी दे सकते है। अतः मैंने इनसे एक प्रश्न पूछा किन्तु उसका उत्तर तो ये क्या देंगे, दो बार सुनकर भी इन्हें प्रश्न समझ नहीं आया। अब तुम आ गए हो, मेरे प्रश्न को सुलझा दो।’’ यह कहकर बादशाह ने प्रश्न दोहराते हुए बीरबल से कहा - ‘दो अबके ले आओ, दो तबके और दो ऐसे जो न अबके हों न तबके।’

बीरबल ने झुककर फौरन कहा - ‘‘जहाँपनाह! यह तो बहुत सरल सी बात है। यदि आप आज्ञा दो तो मैं इन सबको कल आपके समक्ष उपस्थित कर दूँगा।’’

दूसरे दिन प्रातः काल बीरबल यमुना तट गए। यमुना के किनारे ही राजा महाराजाओं के तम्बू लगे हुए थे। एक ओर दूर-दूर तक कुछ साधु संन्यासी धूनी रमाए प्रभु भजन में मग्न थे। बीरबल ने दो राजाओं के पास जाकर कहा - ‘‘आपको बादशाह अकबर ने बुलाया है, मेरे साथ चलिए।’’

उसके बाद वहाँ स्थित दो साधुओं से प्रार्थना करते हुए बीरबल ने कहा - ‘‘महात्मन्! बादशाह अकबर आपके दर्शन करना चाहते हैं। अतः आप कृपा करके मेरे साथ चलिए।’’ चारों को साथ लेकर वे चाँदनी चौक पहुँचे। वहाँ पटरी पर बैठे हुए दो गरीब याचकों को देखकर बोले - ”तुम दोनों मेरे साथ चलो मैं तुम्हें अकबर बादशाह की राजसभा में ले जाना चाहता हूँ।’’

उन छःह व्यक्तियों को साथ लेकर बीरबल राजसभा में पहुँचे। बीरबल को देखते ही बादशाह ने उत्साह-वश पूछा - ‘‘क्यों बीरबल! हमारे प्रश्न का उत्तर मिल गया?’’

बीरबल ने कहा - ‘‘जी मालिक! आपके प्रश्न का उत्तर मैं साथ ही ले आया हूँ।’’ दरबारियों ने बीरबल के साथ आने वाले उन छः व्यक्तियों की ओर आश्चर्य से देखा कि ये व्यक्ति राजा के प्रश्न का उत्तर कैसे हो सकते हैं? उन्हें यह माजरा तनिक भी समझ न आया।

बीरबल को प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा - ‘‘जहाँपनाह! आपने कहा था कि दो अबके लाओ तो ये दो राजा जो आपके सामने प्रस्तुत हैं, ये दो अबके हैं। पिछले जन्म में इन्होंने जप, तप, दान पुण्य किया, उसका फल ये अब भोग रहे है अतः ये अबके हैं। ये दो तपस्वी साधु तबके हैं। आज ये तप कर रहे है, प्रभु भजन करते हुए कष्ट सहन कर रहे हैं। अपने कल्याण के साथ जन-कल्याण भी कर रहे है। अगले जन्म में इन्हें सुख मिलेगा अतः ये तबके हैं। ये दोनों गरीब याचक हैं। ये न अबके हैं, न तबके हैं। ये न पहले तप कर पाए, न अब करते हैं। इसलिए न आज सुख है, न भविष्य में होगा।’’

यह सुनकर सारे दरबारी अवाक् रह गए और बादशाह बहुत खुश हुए। अन्त में बादशाह अकबर ने सभी दरबारियों को बीरबल की विशेषताएँ बतलाते हुए कहा - ईर्ष्या को निरस्त करने के लिए इस बात को सदा याद रखो -

‘‘गुण से गुड़ मिले।’’


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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