घर में सुख तो बाहर सुख

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

घर में सुख तो बाहर सुख

कहते हैं कि पहले घर में दीया जला कर फिर मन्दिर में दीया जलाना चाहिये। घर में सुख और शान्ति की हरियाली हो तो बाहर हर जगह आनन्द मिलता है। जिसका हृदय कोमल व सरल हो और स्वभाव शीतल हो उनकी गृहस्थी सफल हो जाती है।

जो परिवार से निकटता का सम्बन्ध न बनाकर बाहर की दुनियादारी में उलझे रहते हैं, उनके घर का सुख चैन समाप्त हो जाता है। जिस परिवार में विनय और विवेक पूर्ण व्यवहार नहीं, उस घर को रणभूमि बनते देर नहीं लगती।

घर की शान्ति जीवन का अनिवार्य अंग है और साधना की पृष्ठभूमि भी है। ‘‘आप ने ऐसा कहा था’’ यह कहने की बजाय ‘‘मैंने ऐसा समझा था’’ यह कथन आपसी नजदीकी बढ़ाता है।

एक गांव में चार मित्रों की एक टोली रहती थी। साथ में उठना-बैठना और किसी भी विषय को लेकर चर्चा करना, यह उनका प्रतिदिन का क्रम था। एक बार उनकी चर्चा इस विषय पर चल पड़ी कि आदमी की इज्ज़त कहां रहती है? बिना इज्ज़त के इस संसार में कोई जीना नहीं चाहता। धन के बिना जीना आसान है किन्तु इज्ज़त के अभाव में जीना मुश्किल है। उनकी प्रश्न चर्चा इस तरह विस्तृत होती गई और उन्होंने सोच लिया कि इस बात का उत्तर प्रत्यक्ष रूप से ढूंढना चाहिये।

एक बार वे चारों कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा सामने से एक सेठ जी आ रहे हैं। उनके चेहरे से झलक रहा था कि वे सेठ जी बहुत दुःखी व बेचैन हैं। उन्होंने सेठ को प्रणाम कर के पूछा - ”सेठ जी! हम आपसे एक प्रश्न पूछना चाहते हैं। बताइये कि आप की इज्ज़त कहां रहती है?“ सेठ जी को उनका यह प्रश्न कुछ समझ नहीं आया। वे तैश में बोले - ”यह कैसा प्रश्न है? क्या तुम मेरी इज्ज़त का स्थान पूछना चाहते हो? मेरी इज्ज़त मेरे साथ है। इज्ज़त भी क्या कोई छोड़ने जैसी चीज है, जो कहीं छोड़ कर आ जाऊँ?

उन चारों ने सेठ की बात सुनकर उनका नाम तथा घर का पता पूछ लिया और आगे चल पड़े। चारों ने आपस में विचार किया कि जब तक इस सेठ के घर जाकर नहीं देखेंगे तब तक इस प्रश्न का उत्तर अधूरा ही रहेगा। कुछ देर के बाद उन चारों को मार्ग में चलते हुए एक और सेठ मिले जिनका मुख मण्डल प्रसन्नता से खिला था। उन्होंने उस सेठ से भी वही प्रश्न पूछा।

सेठ ने बड़ी गम्भीरता के साथ उत्तर दिया - ‘‘मेरी इज्ज़त के बारे में क्या पूछते हो? वह तो मेरे घर पर है। क्या मैं उसका भार लादे-लादे फिरूँ?’’ उन चारों ने इस सेठ का भी नाम और पता पूछ लिया। कुछ दिनों के बाद वे चारों उस गाँव में पहुँचे जहाँ दोनों सेठों के निवास स्थान थे।

सबसे पहले वे उस सेठ के घर गये जिसने कहा था कि मेरी इज्ज़त मेरे साथ है। उस समय घर में उनका लड़का बैठा हुआ था। उन्होंने उससे पूछा - ”सेठ जी कहाँ गये हुए हैं?“ लड़के ने रूखा सा उत्तर देते हुए कहा - ‘‘कहीं बाहर गये होंगे। पता नहीं कहां गये हुए हैं। क्या वे मुझसे पूछ कर जाते हैं? वे कब तक आयेंगे यह भी मैं नहीं जानता।”

घर में आए अतिथि का आगत स्वागत तो दूर, मुँह से मीठा बोलना भी सेठ के पुत्र को पसन्द नहीं था। उन चारों ने प्रत्यक्ष रूप से देख लिया कि सेठ जी बिल्कुल ठीक कह रहे थे। मेरी इज्ज़त मेरे साथ है। वास्तव में उनकी इज्ज़त उनके घर में नहीं, उनके साथ है।

दूसरे सेठ के घर पर जाकर भी उन्होंने यही प्रश्न पूछा तब उनके लड़के ने बड़ी विनम्रता के साथ उन चारों को आदर सत्कार पूर्वक बैठाया। उनका स्वागत करके खूब आग्रह के साथ उन्हें चाय-नाश्ता कराया। कुछ देर के बाद पुनः पूछने पर वह बोला - ‘‘इस समय पिता जी कहीं जरूरी काम से गए हुए हैं। उन्हें लौटने में दो चार दिन का समय लग सकता है। फरमाइए, क्या काम है? यदि मैं उस कार्य को करने में सक्षम होऊँगा तो अवश्य करूँगा।’’

उन चारों ने कहा - ‘‘भाई! यह जवाब आप हमें पहले भी दे सकते थे, फिर हमें यहाँ रोका क्यों?“ लड़के ने बड़े प्यार से कहा - ‘‘महानुभावों! आपकी बात यथार्थ है। यदि मैं आपके पूछते ही प्रश्न का उत्तर दे देता तो न आप यहाँ रुकते और न ही मेरा आतिथ्य स्वीकार करते। घर आया मेहमान खाली चला जाए, यह कैसे हो सकता है? मेरे पिताजी ने मुझे बचपन से यही पाठ पढ़ाया है। ‘घर आया मा जाया’ अर्थात् जो भी आपके घर में आ जाए, वह आप के भाई के समान है। उसका दिल खोल कर स्वागत करना चाहिए। अतः मैंने अपने पिताजी की आज्ञा का ही पालन किया है।’’

उसके मधुर व्यवहार से चारों बहुत प्रभावित हुए और सोचने लगे कि सेठ जी ने कितनी सत्य बात कही थी। मेरी इज्ज़त मेरे घर पर है। जिसकी इज्ज़त उसके घर से बाहर रहने पर भी घर में विद्यमान रहे, उसे बाहर भी सर्वत्र सुकून मिलता है।

तभी कहते हैं -

‘‘घर में सुख तो बाहर चैन’’


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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