घर का जोगी जोगड़ा

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

घर का जोगी जोगड़ा

घर में रहने वाले योगी को लोग तब तक ढोंगी समझते हैं जब तक वह अन्य लोगों के द्वारा सिद्ध पुरुष के रूप में विख्यात न हो जाए। सब कुछ देखने वाली आँखे जैसे सबसे निकट रहते हुए काजल को नहीं देख सकती ऐसे ही हम अपने इर्द-गिर्द रहने वालों का मूल्य नहीं समझ पाते। अक्सर लोग आकाश के तारों को पकड़ने के लिए धरती के फूलों को कुचल देते हैं। जो चीज हमसे जितनी दूर होती है वह उतनी ही सुहावनी लगती है। आज का मनुष्य इतना कठोर है कि वह जीते जी किसी की कद्र नहीं करता और मर जाने के बाद उसका शृंगार करता है।

भारतीय संस्कृति में गृहस्थ संतों की एक परम्परा रही है। उनमें से एक गृहस्थ संत महाराष्ट्र में हुए जिनका नाम था संत ज्ञानेश्वर। उनका जीवन ज्ञान, भक्ति और करुणा से ओतप्रोत था। ग्रामवासियों ने संत ज्ञानेश्वर को सपरिवार भाई-बहन और पत्नी मुक्ताबाई सहित अपमानित करके गाँव से बाहर निकाल दिया। यदि उन्हें ‘‘जोगड़ा’’ मानकर भी गाँव में रखते तो भी गनीमत थी। विवश होकर संत ज्ञानेश्वर उस गाँव से चल पड़े। उनके मन में किसी के प्रति क्रोध या दुर्भाव नहीं था। दिन रात वे भगवद्भक्ति में लीन रहते थे किन्तु उनके परिवार के अन्य लोग कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहे थे।

ऐसी परिस्थिति में महाराष्ट्र के पैठण ग्राम के एक सज्जन और धार्मिक व्यक्ति ने जब संत ज्ञानेश्वर को देखा तो वे उन्हें पैठण शहर में ले गए। कुछ दिनों में पैठण निवासियों को धीरे-धीरे संत ज्ञानेश्वर के ज्ञान से प्रीति होने लगी। वे संत का बहुत आदर करने लगे।

पैठण के तथाकथित पण्डितों को अपना भविष्य असुरक्षित लगने लगा। अतः उन्होंने ग्रामवासियों को संत ज्ञानेश्वर के प्रति भड़काना आरम्भ कर दिया। वे पण्डित इस बात का प्रचार करने लगे - ‘‘तुम सब अपनी बुद्धि से सोचो। जब इस ज्ञानेश्वर को उनके गाँव वालों ने अपमानित करके सपरिवार अपने गाँव से निकाल दिया है तो अवश्य कोई कारण होगा। अतः तुम इन्हें अपने गाँव में क्यों रहने देते हो?’’

अधिकांश ग्रामवासियों ने पण्डितों की हाँ में हाँ मिलाकर इस बात का समर्थन किया। एक व्यक्ति ने कहा - ‘‘पण्डितजी! आप एक बार चल कर उस ढोंगी ज्ञानेश्वर को यह बता दीजिए कि ज्ञान क्या होता है? आपके प्रकाण्ड ज्ञान के आगे वह परास्त हो जाएगा। फिर हमें उन्हें ग्राम के बाहर निकालना आसान हो जाएगा।’’

पण्डित दूसरे दिन संत ज्ञानेश्वर के पास पहुँचकर अकड़कर बोले - ‘‘क्या तुम हमसे शास्त्रार्थ करने का साहस करोगे?’’ संत ज्ञानेश्वर ने सहज रूप से कहा - ‘‘मैं भला आप जैसे विद्वान पण्डित से क्या शास्त्रार्थ करूँगा? मैं तो भगवान का भजन करने वाला एक साधारण भक्त हूँ। बस इतना ही जानता हूँ कि संसार के सभी जीवों में परमात्मा का वास है। अतः सब से प्रेम रखना चाहिए और सब पर दया करनी चाहिए।’’

संत ज्ञानेश्वर के मुख से ज्ञान की ऊँची-ऊँची बातें सुनकर पण्डित जी तिलमिला उठे और उन्होंने पास में खड़े हुए एक भैंस की पीठ पर डण्डा मारते हुये कहा - ‘‘क्या इस भैंस में तुम्हारा परमात्मा निवास करता है?’’

संत ज्ञानेश्वर ने कहा - ”जी पण्डित जी! देखिए।“ कहकर उन्होंने अपना उपवस्त्र हटाकर अपनी पीठ दिखलाई। उनकी पीठ पर डण्डे के निशान उभरे हुए थे। यह देखकर समस्त ग्रामवासी एवं स्वयं पण्डितजी चक्कर में पड़ गए कि डण्डे भैंस की पीठ पर मारे गए थे और निशान संत की पीठ पर उभर आए हैं। पण्डित जी अपनी हार सहज ही मानने वाले नहीं थे। अतः बोले - ‘‘मुझे लगता है कि यह ज्ञानेश्वर जादूगर है। मैं इसके मायाजाल में यूँ ही फँसने वाला नहीं हूँ। यदि तुम कहते हो कि सभी जीवों में परमात्मा का वास है तो हमें इस भैंस के मुख से वेद-मंत्र का पाठ सुनवाओ। हम तभी मानेंगे आपकी बात सही है।’’

यह सुनकर संत ज्ञानेश्वर उस भैंस के पास गए और उसके शरीर पर प्रेमपूर्वक हाथ फेरते हुए कहा - ‘‘प्रभु! ये पण्डित प्रवर आपके मुख ही से वेद मंत्र सुनना चाहते है। कृपा कीजिए, प्रभु! इन्हें वेदमंत्र सुना दीजिए।’’

एक महान आश्चर्य घटित हुआ। वह भैंस परम शुद्ध गीर्वाण (संस्कृत) भाषा में वेदमंत्रों का अविकल पाठ करने लगी। वे अहंकारी और ईर्ष्यालु पण्डित तथा वे अबोध ग्रामवासी कुछ क्षण के लिए स्तब्ध अवाक् तथा मुँह बाए खड़े के खड़े रह गए।

कुछ देर बाद उनकी संज्ञा लौटने पर वे सभी एक साथ संत ज्ञानेश्वर के चरणों में गिरे पड़े। इस चमत्कार की चर्चा आस-पास के समस्त गाँवों में फैल गई। धीरे-धीरे यह बात उस गाँव तक भी पहुँची जिन्होंने संत ज्ञानेश्वर को अपमानित करके सपरिवार गाँव से बाहर कर दिया था। वे भी क्षमा का दान माँगने लगे। वे अपनी भूल को स्वीकार करते हुए कह रहे थे - ‘‘घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध।’’

सभी को यह बात भली-भाँति समझ में आ गई थी कि उनके गाँव के सौभाग्य से उनके यहाँ कोई ‘जोगड़ा’ नहीं, कोई ढोंगी नहीं, एक सच्चा सिद्ध निवास कर रहा था।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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