दुःख-सुख अपने कर्मफल के अनुसार फलित होता है

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

दुःख-सुख अपने कर्मफल के अनुसार फलित होता है

महानुभावों! प्राणी के जीवन में दुःख-सुख अपने कर्म-फल के अनुसार ही फलित होते हैं क्योंकि जब तक क्रोध, मान, माया और लोभ से हम स्वयं को मुक्त नहीं करेंगे तब तक मोक्ष की प्राप्ति संभव ही नहीं है। जीव अनादि काल से कषायों के कारण कर्म-बंध कर रहा है और यही संसार में परिभ्रमण का कारण है। कर्म-फल भोगने के लिए उसे विभिन्न पर्याय धारण करनी पड़ती हैं। अच्छे कर्म का फल सुख रूप में और बुरे कर्म का फल दुःख रूप में भोगता है। इसमें जीव स्वयं ही कर्ता है और स्वयं ही भोक्ता है। ईश्वर का इसमें कोई हाथ नहीं है। वह न सुख देता है, न दुःख। उसका इन कर्मों से या उनका फल देने से कोई संबंध नहीं है।

आगे मुनि श्री ने कहा कि जो जीव, मनुष्य पर्याय धारण करके भी धर्माचरण नहीं करता, उसे नरकों में असहनीय दुःखों का सामना करना पड़ता है। ये भौतिक सुख सुविधा के साधन हमें शारीरिक सुख-शांति का आभास ही करा सकते हैं पर वास्तविक सुख नहीं दे सकते। परम सुख तो शाश्वत होता है जिसके बाद दुःख का आगमन ही न हो।

मुनि श्री भगवान राम और सीता के चरित्र का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि सीता ने राम द्वारा पुनः जंगल में छुड़वाए जाने के असह्य दुःख की घड़ी में भी सेनापति के द्वारा राम को धर्म न छोड़ने का संदेश भिजवाया। अतः यदि धर्म हमारा साथी है तो आत्म-कल्याण का मार्ग स्वयं ही प्रशस्त हो जाएगा। सांसारिक सुख तो क्षण भर के हैं अतः मानव को इनमें फंसना नहीं चाहिए। स्व को पहचानो और मानव जन्म सार्थक करो।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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