धर्म की जड़ सदा हरी
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
धर्म की जड़ सदा हरी
धर्म की जड़ दया और धर्म का फल सुख बताया गया है। जो धर्म की जड़ का सतत सिंचन करता है, उसे जीवन में सुख-शांति के फल मिलते हैं। धर्म जब आन्तरिक जीवन को प्रभावित करता है तब वह बाहर स्वतः प्रकट हो जाता है और जिसके अन्तः करण को स्पर्श नहीं करता उसके लिए वह आडम्बर मात्र रह जाता है।
धर्म का केन्द्रिय अर्थ है - सभी आत्माओं का समादर करना जिससे प्राणी मात्र के प्रति परस्पर मैत्री, आत्मीयता, एकता और सहानुभूति के भाव प्रवाहित होते रहे। शक्तिशाली बनने के लिए मनुष्य भले ही विज्ञान के सामने घुटने टेकता हो परन्तु आनन्दित रहने के लिए धर्म की शरण स्वीकार किये बिना काम नहीं चल सकता।
धर्म जगे तो सुख जगे, तन मन पुलकित होय।
धर्म छुटे तो सुख छुटे, तन मन विचलित होय।।
एक महात्मा के पास दो युवक कुछ जिज्ञासा लेकर आए। उन्होंने महात्मा से प्रार्थना की - ‘‘महात्मन्! हमने धर्म की बहुत किताबें पढ़ी हैं। सत्संग एवं प्रवचन भी बहुत सुने हैं किन्तु हमारी जिंदगी में धर्म नहीं है। आप हमें धर्म को धारण करने का मूलमंत्र बताइए।’’ कुछ क्षण सोचकर महात्मा ने उत्तर दिया - ‘‘इस समय मुझे किसी जरूरी कार्य से जाना है। तुम कल ठीक इसी समय आ जाना, तुम्हें जवाब मिल जाएगा।’’
दूसरे दिन वे दोनों युवक ठीक समय पर पहुँचने के लिए अपने-अपने घर से निकले। मार्ग में चलते हुए एक युवक को सड़क के किनारे बैठी हुई अंधी बुढ़िया मिली। युवक के कदमों की आहट सुनकर बुढ़िया ने उससे कहा - ‘‘भाई! मुझे किसी वृक्ष की छाया में बिठा दो! मैं गर्मी से बहुत परेशान हूँ।“
उस युवक ने कहा - ‘‘माई! अभी मेरे पास समय नहीं है। आज नियत समय पर महात्मा के चरणों में जरूरी पहुँचना है। तुम्हें आज छाया में बैठाने वाला कोई और यात्री मिल जाएगा किन्तु मैं विलम्ब में पहुँचा तो महात्मा मुझे धर्म का मूलमंत्र नहीं बताएँगे?’’ यह कहते हुए वह युवक आगे बढ़ गया।
थोड़ी दूरी तय करने पर उसने देखा एक किसान की बैलगाड़ी का पहिया कीचड़ में धँस गया था। बैल जोर लगाकर भी उसे निकाल नहीं पा रहे थे। उस किसान ने युवक से प्रार्थना की - ‘‘बेटा! तनिक मेरी गाड़ी को सहारा दे दो, मैं बहुत देर से यहाँ परेशान हूँ।’’
उस युवक ने तेज कदमों से आगे बढ़ते हुए बड़ी लापरवाही और अशिष्टता से उत्तर दिया - ‘‘क्या मैंने तुम्हें परेशान किया है जो मैं तुम्हारी सहायता करूँ? यदि मैं तुम्हारी गाड़ी को धक्का मारूँगा तो मेरे वस्त्र कीचड़ में भर जाएँगे। मुझे धर्म को धारण करने का मूलमंत्र सीखने महात्मा के पास शीघ्र पहुँचना है।’’
कुछ आगे बढ़ने पर उस युवक को एक लकड़हारा मिला। लकड़ियों का भार उसके पास रखा था। लकड़हारे ने युवक से विनम्र निवेदन किया - ‘‘भाई! यह बोझ मेरे सिर पर रखवा दो।’’
युवक ने उसे रूखे शब्दों में जवाब देते हुए कहा - ‘‘मेरे पास इतना समय नहीं कि मैं तुम्हारा काम करूँ। यदि मैं यहाँ से नहीं गुजरता तो तुम क्या करते? थोड़ी देर और इंतजार कर लो तुम्हें कोई न कोई राहगीर मिल जाएगा। मैं इस समय अपना एक क्षण भी व्यर्थ गँवाने की स्थिति में नहीं हूँ।’’ यह कहते हुए वह आगे बढ़ गया।
युवक नियत समय पर महात्मा के पास पहुँचा और बोला - ‘‘महात्मन्! मैं निश्चित समय पर आ गया हूँ। मुझे धर्म को धारण करने का मूलमंत्र बता दीजिए।’’
महात्मा ने कहा - ‘‘धैर्य रखो युवक! तुम्हारे दूसरे मित्र को भी आने दो। मैं तुम दोनों को एक साथ ही मंत्र देना चाहता हूँ।’’ वह युवक अधीरता से मित्र का इंतजार करने लगा।
दूसरा युवक घर से चला तो उसे भी मार्ग में वह वृद्ध अंधी महिला मिली। उसने भी उस युवक से वृक्ष के नीचे पहुँचाने की प्रार्थना की। युवक ने बड़े प्रेम से उस वृद्धा को वृक्ष की शीतल छाया में पहुँचाया और आगे बढ़ गया। उसने किसान की कीचड़ में फँसी गाड़ी भी बाहर निकलवाई। उसके वस्त्र कीचड़ से लथपथ हो गए थे लेकिन उसने वस्त्रों की चिन्ता नहीं की। कुछ आगे बढ़कर उसने लकड़हारे का बोझ उठवाने में सहायता की, फिर वह महात्मा की कुटिया पर पहुँचा।
महात्मा ने उस युवक से देरी से आने का कारण पूछा। युवक ने सहज भाव से बताया - ‘‘महात्मन्! मार्ग में एक अंधी बुढ़िया को वृक्ष की छाया तक पहुँचाने, किसान की गाड़ी को कीचड़ से निकलवाने और एक लकड़हारे की सहायता करने के कारण मुझे कुछ देरी हो गई है। इसके लिए मैं क्षमा चाहता हूँ।’’
महात्मा ने पहले वाले युवक से पूछा - ‘‘क्या ये तीनों लोग तुम्हें नहीं मिले?’’ युवक ने कहा - ‘‘क्यों नहीं मिले! मुझे भी उन तीनों ने अपनी सहायता के लिए पुकारा था परन्तु मुझे धर्म का मूलमंत्र प्राप्त करने निश्चित समय पर यहाँ पहुँचना था, अतः मैंने किसी की भी मदद नहीं की।
महात्मा ने गंभीर स्वर में कहा - ‘‘वत्स! दया धर्म का मूलमंत्र है। जहाँ दया का भाव नहीं है, वहाँ धर्म की जड़ें सूखने लग जाती हैं। जिसके भीतर करुणा सदा रहती है वह अपनी शक्ति असहायों की सहायता में अवश्य लगाता है। जिसके जीवन की नींव में धर्म होगा उसके जीवन में सुख-शांति और आनन्द की हरियाली रहेगी। इसलिए कहते हैं -
‘‘धर्म की जड़ सदा हरी।’’
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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