देखा देखी मत करो

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

देखा देखी मत करो

देखा देखी करने वाला व्यक्ति दूसरों के प्रभाव से जीता है और अपनी स्वाभाविकता को खो देता है।

दूसरों में जो कुछ अच्छा देखो उसे आत्मसात् करना सीखो न कि उसका अंधानुकरण करना आरम्भ कर दो।

दूसरों की टोपी आपके सिर पर कैसे फिट बैठेगी? दूसरों के जूते आपके पैर में कैसे फिट बैठेंगे? क्योंकि अंधानुकरण विकृति है, बोझ है और थकान है।

हमारे तनावों का मुख्य कारण है कि हम भेड़चाल से चलते हैं। परिणामस्वरूप हम अपने प्रति सच्चे न रहकर दूसरों को प्रसन्न करने में लग जाते हैं।

राजस्थान की एक सत्य कथा है। एक सेठ अपने आवश्यक कार्य से नगर के बाहर गया हुआ था। घर लौटते-लौटते रात हो गई थी। थकान से उसका सारा शरीर टूट रहा था। जैसे-तैसे घर पहुँचा और बिस्तर पर बैठते हुए पत्नी को आवाज लगा कर बोला - ‘‘आज मैं प्यास से व्याकुल हूँ और थक भी गया हूँ। तुम जल्दी से पानी ले आओ।’’ यह सुन कर सेठानी फौरन पानी लेने अन्दर गई। जब तक वह पानी लेकर लौटी तब तक सेठ जी की आँख लग गई।

सेठानी ने सोचा कि इन्हें नींद से जगाना उचित नहीं क्योंकि प्यास के कारण हो सकता है, वे स्वयं जाग जाएं। यदि मैं सो गई और इनकी नींद खुल गई तो इन्हें पानी कौन देगा? अतः वह पानी का लोटा लेकर चुपचाप बिस्तर के पास खड़ी रही।

जब सुबह हुई और सेठ की नींद खुली तो वह देख कर हैरान हुआ - ”अरे! तुम पानी का लोटा लिये क्यों खड़ी हो?“ सेठानी ने बड़े विनम्र स्वर में कहा - ‘‘जब आप यात्रा से लौटे थे तब आपको बहुत प्यास लगी थी। आपने मुझसे पानी मांगा था परन्तु जब तक मैं पानी लाई, तो आपकी आँख लग गई। मैंने सोचा कि नींद से जगाना उचित नहीं है और आपको प्यास लगी है। पता नहीं कब नींद टूटे और आप पानी मांगे। इसी प्रतीक्षा में मैं यहां पानी ले कर खड़ी हूँ।’’

यह सुनकर सेठ का हृदय गदगद हो गया। सेठ ने सेठानी के हृदय-स्पर्शी सेवा-भाव की चर्चा आस-पास के मित्र-पड़ोसियों से भी की। इस प्रकार उत्तम सेवा-भाव की सुवास राजमहलों तक पहुँच गई। सारी रानियाँ उस सेठानी की मुक्त-कंठ से प्रशंसा करने लगी। जब राजा के कानों तक यह बात पहुँची तो उन्होंने सोचा कि मैं कितना धन्यभागी हूँ। ऐसी सेवाभावी नारी मेरे राज्य को सुशोभित कर रही है। मुझे इसका सम्मान अवश्य करना चाहिये। राजा स्वयं उसके घर की ओर चल पड़ा और हीरे मोती के थाल प्रदान कर उसका खूब सम्मान किया।

राजा का स्वयं चल कर आना और प्रचुर हीरे मोती द्वारा सेठानी का सम्मान करना; इस बात से चारों और खलबली मच गई। पड़ोस में रहने वाली एक सेठानी के दिल में ईर्ष्या की आग भड़क गई। वह बार-बार अपनी सहेलियों से कहने लगी कि यह भी कोई बड़ी बात है। कल हम भी ऐसा करके दिखा देंगे।

दूसरे दिन उसने पति को आदेश देते हुए कहा - ‘‘आज आप नगर से बाहर जायेंगे और रात्रि में थक कर लौटेंगे। घर में आते ही पानी मांगेंगे और जब तक मैं पानी ले कर आऊँ, तब तक आप सो जायेंगे। फिर मैं भी उस सेठानी की तरह आप के लिये रात भर खड़ी रहूँगी। सुबह आँख खुलने पर मुझसे कारण पूछना और इस बात को आसपास में फैला देना तो राजा कल हीरे जवाहरात लेकर हमारे द्वार पर भी आयेंगे।’’

यह सुन कर सेठ भी हर्षित हुआ। दूसरे दिन सुबह होते ही वह नगर के बाहर चला गया। रात्रि में थका-माँदा लौटा। पत्नी को पानी लाने का आदेश दिया। सेठानी पहले से तैयार बैठी थी। वह तुरंत पानी ले कर आई। इतने में सेठ निद्राधीन हो गया। अब सेठानी सोचती है कि इस समय न कोई मुझे देख रहा है और यह बात किसी को मालूम भी नहीं। फिर रात भर खड़े रहने का मतलब भी क्या है? सुबह उठ कर थोड़ी देर के लिये फिर खड़ी हो जाऊँगी। यह सोचकर वह सो गई।

सुबह सेठ के उठने पर सेठानी पुनः पानी का लोटा लेकर खड़ी हो गई। सेठ ने हर्षित होकर सारी खबर आस-पास वालों में फैला दी। नाटक बखूबी से पूरा किया गया। परन्तु कहीं से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। लोगों की प्रतीक्षा करते-करते शाम हो गई। कोई भी सेठानी को धन्यवाद देने नहीं आया। जब लोग नहीं आए तो राजा के आने की बात तो बहुत दूर थी। अब उस सेठानी को बहुत रोष आया कि मेरे साथ अन्याय हो रहा है। पड़ोस की सेठानी के साथ राजा ने इतना सम्मान-पूर्ण व्यवहार किया और मेरे साथ इतना रूखा व्यवहार।

उसने सेठ से कहा - ‘‘कल सुबह राज दरबार में आप मेरी ओर से शिकायत ले कर जाना और कहना कि मुझे इस बात का न्याय चाहिए?

सेठ दूसरे दिन राजा के दरबार में शिकायत ले कर पहुँचा। सारी बात सुनते ही राजा एवं समस्त दरबारी खिलखिला कर हंस पडे़। राजा ने सेठ को शिक्षा देते हुए कहा - ‘‘इस दुनिया में जो घटनाएं अनायास सहज रूप से घटती है, उसी का प्रभाव दूसरों पर पड़ता है। जो सेवा आन्तरिक भावों से होती है, उस में फूलों की सुगंध होती है और जो नाटकीय ढंग से होती है, उसमें कागज़ के फूल की तरह सुगंध नहीं होती। अतः इस जीवन-सूत्र को सदा याद रखो -

‘‘देखा देखी मत करो’’


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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