भलाई कर बुराई से डर
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
भलाई कर बुराई से डर
जीवन बगिया का सच्चा माली वह है जो मन की भूमि से बुराई के कांटों को उखाड़ फेंकता है और उसमें भलाई के अनूठे बीज बोता है। जो बोओगे वही मिलेगा। आम बोओगे, आम मिलेगा। नीम बोओगे, नीम मिलेगा। जो आप अपने लिए चाहते हैं, वह दूसरों के लिये चाहना और करना ही भलाई है। जो आप अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के लिये चाहना और करना बुराई है।
जीवन में बुराई करने के अवसर दिन में सौ बार आते है और भलाई का वर्ष में एक बार।
भलाई प्रकट मत कीजिये, प्रकट कीजिये बुराई।
प्रकट से दोनों घटे, न बचे भलाई और न ही बुराई।
एक मुनि किसी निर्जन वन में ध्यानस्थ थे। उस समय एक ब्राह्मण वहां से गुजरा जो बड़ा दयालु था। उसने मुनिराज को देख कर विचार किया कि इस मुनिराज के शरीर पर एक भी वस्त्र नहीं है। इस जंगल में और शीतकाल की ऐसी भयंकर सर्दी में ये बेचारे ठंड से मर जायेंगे। करुणा भाव से ओतप्रोत होकर वह तत्काल अपने घर गया। उसी समय बाजार से एक मोटा कीमती कम्बल खरीद कर जंगल की ओर चल पड़ा। वहां मुनिराज को वन्दन कर कम्बल उनके पास में रख दिया। मुनिराज अब भी आत्मचिन्तन की गहराई में ध्यानस्थ थे।
वह ब्राह्मण वहां से दूसरे नगर की तरफ चल दिया। कुछ समय बाद एक चोर उस निर्जन वन से गुजरा। मुनिराज के पास रखा हुआ बढ़िया कम्बल देखकर उसके मन में विचार आया - ‘‘मुनि की आँखें बन्द हैं। अतः यह बढ़िया कम्बल मुझे उठा लेना चाहिये। यदि ये मुनि मुझे कम्बल नहीं लेने देंगे तो मेरे पास डंडा भी है। इस डण्डे से ऐसी जोरदार मार लगाऊँगा कि ये दुबली-पतली काया नीचे लुढ़क जायेगी और मैं यह कम्बल उठा कर भाग जाऊँगा।“ ऐसा विचार कर चोर ने कम्बल उठाया और वहाँ से चल दिया। मुनिराज अब भी ध्यान में मग्न थे। चोर अपनी चतुराई पर प्रसन्न हो रहा था कि मुनिराज ने आँखें नहीं खोली और इनको कुछ भी पता नहीं लगा।
उधर वह दयालु ब्राह्मण चलते-चलते पचास कोस दूर चला गया। उसने सोचा कि जिस नगर में पहुँचना है, वह अब बिल्कुल नज़दीक है। अतः वह एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने हेतु रुका।
उस नगर के राजा की हृदयाघात के कारण मृत्यु हो जाने से प्रजा में बड़ी हलचल थी। चारों तरफ हाहाकार हो रहा था। समस्त राजपरिवार एवं मंत्रीमंडल इसलिए भी अधिक चिन्तित था कि राजा निस्सन्तान था। मंत्रियों ने विचार किया कि जब तक दूसरा राजा राजगद्दी पर नहीं बैठ जाता तब तक राजा के शव का दाह संस्कार नहीं किया जा सकता।
एक अनुभवी मंत्री ने दीर्घदृष्टा बन कर मंत्रणा दी कि राजा का हाथी चतुर है। वह जिसको माला पहनाएगा, वही राजा बन जायेगा। हाथी को राजसी ढंग से सजाया गया और हाथी की सूंड में एक माला रखते हुए मंत्री ने कहा - ‘‘हे गजराज! राजगद्दी का फैसला अब आपके हाथ में है। आप उचित पात्र के गले में माला पहनाकर राजा का चुनाव कर दीजिये।”
हाथी उस माला को लेकर भीड़ को चीरता हुआ आगे निकल गया। अनेकों के अरमान मन के मन में ही रह गए। हाथी उन्हें पार करता हुआ आगे बढ़ गया। चारों दिशाओं में भ्रमण करता हुआ हाथी सीधा वहीं जा पहुँचा जहाँ वृक्ष के नीचे वह ब्राह्मण विश्राम कर रहा था। हाथी की दृष्टि उसी दयालु ब्राह्मण पर टिक गई। हाथी ने ब्राह्मण के पास पहुँच कर उस के गले में माला डाल दी।
तुरन्त महावत हाथी से उतरा। उसने जय जय कार करते हुए उस ब्राह्मण को हाथी के ऊपर बैठा लिया और राजदरबार में ले आया। ब्राह्मण विस्मय से सारे दृश्य देख रहा था। वहाँ बहुत बड़े समारोह के साथ धूमधाम से राज्याभिषेक करके उसे राजा बना दिया गया। इसके बाद राजा का दाह-संस्कार का कार्य सम्पन्न किया गया। राजा बना हुआ वह ब्राह्मण यह सब चमत्कार देख कर सोचने लगा कि मुनिराज को कम्बल का दान देने का ही यह प्रभाव है जो मुझे अनायास राज्य की प्राप्ति हुई। अब वह मुनि-महात्माओं का भक्त बन कर तन, मन व धन से सेवा भक्ति करने लगा। उसके दयाभाव के कारण उस राज्य में प्रजा भी सुख शान्ति से रहने लगी।
इधर वह चोर कम्बल को ले कर जा रहा था। भागते-भागते अचानक उसने पीछे मुड़ कर देखा कि किसी राजा की फौज उसके पीछे चली आ रही थी। उसे ऐसा महसूस हुआ, जैसे ये लोग मुझे शीघ्र पकड़ना चाहते है। भय के कारण वह दौड़ता आगे को और देखता पीछे की तरफ। मार्ग में जमीन के समतल बना हुआ एक बिना पानी का कुँआ था। चोर उसमें गिर गया और वहीं तड़प-तड़प कर मर गया।
इस कहानी का गहराई से चिन्तन करने पर एक अटल सत्य सामने आता है। ब्राह्मण दान देकर राजा बना और चोर चोरी करके कुँए में गिरा। स्पष्ट है मुनिराज ने न तो ब्राह्मण को राज्य दिया और न चोर को कुएं में गिराया। मुनिराज ने न किसी को आशीर्वाद दिया था और न दुराशीष। वे दोनों समय ध्यानस्थ थे। अपने अच्छे-बुरे कर्मों का फल सबको मिलता है, यही शाश्वत स्मरणीय सत्य है। अतः
‘‘भलाई कर बुराई से डर’’
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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