आई मौत को टाले कौन?
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
आई मौत को टाले कौन?
यदि किसी व्यक्ति का काल न आया हो तो सैंकड़ों बाणों से बिंधने पर भी वह नहीं मरता। किन्तु जिसका काल आ गया हो वह कुशा की नोक से बिंधने मात्र से भी मर जाता है। जब एक दिन मौत की गोद में सोना है तो समझ नहीं आता कि यह मनुष्य क्यों इतने पाप करता है और क्यों दूसरों की जिंदगी से खेलता है? जिंदगी में मृत्यु से अधिक सुनिश्चित और कोई भी तथ्य नहीं है फिर भी यह नादान इन्सान मौत को टालने का या मौत को भुलाने का इन्तजाम क्यों करता है?
मौत से बचने के लिए किया गया हर प्रयास आदमी को मौत के बहुत करीब खड़ा कर देता है। अतः मृत्यु के विपरीत स्वभाव को जान लो वहाँ Break नहीं है, न Reverse Gear है।
एक पौराणिक कथा है। कहा जाता है, ऋषि वेदव्यास जी के नाना जी को मौत से बहुत डर लगता था। वे मरना ही नहीं चाहते थे। अतः दिन-रात उनके मन में एक ही विचार घूमता था, कुछ ऐसा उपाय हो जाए जिससे मैं सदा के लिए अमर हो जाऊँ। एक बार घूमते-घूमते नारद जी महर्षि वेदव्यास जी के घर पहुँचे। व्यास जी ने उनका आदर सहित सत्कार किया और पूछा - ‘‘फरमाइये, नारद जी! आज आप कहाँ से पधार रहे हैं?’’
नारद जी ने प्रत्युत्तर देते हुए कहा - ‘‘महर्षि जी! इस समय मैं यमलोक से सीधा यहाँ पर आ रहा हूँ।’’ उस समय वेदव्यास जी के नाना जी पास में खड़े थे। उन्होंने नारद जी के मुख से जैसे ही यमलोक से आने की बात सुनी तो अपनी मनोव्यथा के निवारण हेतु तुरन्त बोल पड़े - ‘‘नारद जी! इसका मतलब यह हुआ, आपकी यमराज के साथ अच्छी जान-पहचान होगी।’’
नारद जी ने बड़ी सहजता से कहा - ‘‘इसमें कोई शक नहीं। वे मेरे परम मित्र हैं। अतः मेरा आना-जाना अक्सर होता रहता है।’’ यह सुनकर नानाजी ने नारद जी के पैर पकड़ लिये और प्रार्थना करने लगे - ‘‘नारद जी! आपमें बड़ी शक्ति है। आप यमराज से कहकर मेरी मौत सदा के लिए टलवा दीजिए। जब यमराज से आपकी इतनी मित्रता है तो आप मेरे नाम का एक अमर-पत्र लिखवा दीजिए।’’ नानाजी की बात को नारद जी ने फौरन स्वीकार कर लिया और वेदव्यास जी को लेकर वे तीनों सीधे यमराज के पास पहुँच गये।
नारद जी को अतिथियों के साथ आता देखकर यमराज ने उनका स्वागत किया। नारद जी ने वेदव्यास जी के नाना जी का परिचय देते हुए उनके अमर होने की सिफारिश कर दी। यमराज ने नारद जी की बात को अस्वीकार करते हुए कहा - ‘‘किसी को मारना या जिलाना मेरे हाथ में नहीं है। मारने वाली तो मृत्यु होती है लेकिन पता नहीं लोग मुझसे क्यों डरते हैं? मेरा काम Register देखकर उस पर हस्ताक्षर कर देने का है। हाँ, इसके लिए हम मृत्यु के पास चलकर कोई मार्ग निकालते हैं।’’
नारद जी, वेदव्यास जी, नाना जी और यमराज ये चारों मृत्यु के दरबार में गये। मृत्यु ने सबका स्वागत किया और आने का कारण पूछा। यमराज ने वेदव्यास जी के नाना जी की सिफारिश करते हुए कहा - ‘‘ये वेदव्यास जी के नाना जी हैं, इनको मरने से बहुत डर लगता है। अतः आप इनसे दूर रहिएगा।’’
मृत्यु तपाक से बोली - ‘‘यह मेरे अधिकार का विषय नहीं है। मैं अपनी मर्जी से किसी के पास नहीं जाती। मेरे पास काल महाराज संकेत भेजते हैं। उनके आदेश के अनुसार मुझे कार्य करना पड़ता है। अतः इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है। हाँ, आप काल महाराज से आदेश करा दें तो मुझे कोई दिक्कत नहीं है।’’ नाना जी ने वेदव्यास जी को वहाँ से शीघ्र चलने का संकेत किया। तब वे भूखे-प्यासे थके-माँदे वहाँ से अविलम्ब काल महाराज के दरबार में पहुँच गए। काल ने यमराज और मृत्यु के साथ नारद जी के अतिथियों को आते देखा तो सभी का स्वागत करके उनके एक साथ मिलकर यहाँ आने का कारण पूछा। सब ने मिलकर वेदव्यास जी के नाना जी को अमर घोषित कर देने की प्रार्थना की।
काल महाराज तत्काल बोल पड़े - ‘‘यह काम मेरा नहीं है। मेरे पास शंकर भगवान का आदेश आता है। इसलिए आपको उनसे प्रार्थना करनी होगी।’’ काल को भी साथ लेकर वे पाँचों कैलाश पर्वत पर श्री शंकर भगवान के पास गए। सविधि नमस्कार करने के बाद काल महाराज ने श्री शंकर भगवान से प्रार्थना करते हुए कहा - ‘‘भगवान! वेदव्यास जी के नाना जी की मनोव्यथा लेकर आज हम सब एक साथ आपके चरणों में पहुँचे हैं। नाना जी के प्राण न लिए जाएं, इन्हें अमर बना दिया जाए।’’
शंकर भगवान ने तुरन्त विधाता को आदेश दिया - ‘‘वेदव्यास जी के नाना जी की पत्री तत्काल प्रस्तुत की जाए।’’ उन्होंने पत्री को देखा तो काफी देर तक देखते ही रह गए। कैसा अजीब योग है, कितनी विचित्र स्थिति है। होनहार की माया कैसी अटल है। पत्री में जो लिखा था, वह उन्होंने सब के समक्ष पढ़ते हुए कहा - ‘‘अपने नाना जी के साथ जब वेदव्यास जी, नारद जी, यमराज, मृत्यु और काल ये सब मिलकर एक साथ जिस तिथि को शंकर भगवान के दर्शन करने कैलाश पर्वत पर आएँगे, उसी दिन नाना जी की मृत्यु होगी और वह दिन आज है।’’
अपना अमर-पत्र लिखवाने के बजाय नाना जी स्वयं चलकर मृत्यु के मुख में पहुँच गए। वेदव्यास जी, नारद जी, काल महाराज, यमराज और मृत्यु सभी देखते ही रह गए। उस समय शंकर जी के मुख से शब्द निकले -
‘आई मौत को टाले कौन?’
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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