आस्था मस्तिष्क में नहीं हृदय में निवास करती है
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
आस्था मस्तिष्क में नहीं हृदय में निवास करती है
महानुभावों! आस्था मस्तिष्क में नहीं हृदय में निवास करती है। अतः हमारी आस्था का केन्द्र ज्ञान-सम्पन्न मस्तिष्क नहीं बल्कि श्रद्धा-सम्पन्न हृदय होना चाहिए। यदि श्वास-श्वास में भगवान के प्रति भक्ति और विश्वास जम जाए तो भवसागर से पार होने में देर नहीं लगेगी।
आगे मुनि श्री ने कहा कि आस्था के दृढ़ होने पर ही विचार व आचरण उन्नति की ओर अग्रसर होने लगते हैं क्योंकि आस्था से वास्ता होने पर शास्ता स्वयं साधक को रास्ता देता है। जिस प्रकार गहराई में जाकर रत्नाकर से भी रत्न प्राप्त किए जा सकते है, उसी प्रकार भक्ति की गहराई में जाकर सभी रत्नों में श्रेष्ठ रत्नत्रय (सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चारित्र) को प्राप्त किया जा सकता है। यह एक ऐसा अमृत-रत्न है जिसके माध्यम से जन्म, जरा, मृत्यु से मुक्त होकर हम अमर पद को प्राप्त कर सकते हैं।
जैसे समुद्र का खारा पानी विभिन्न क्रियाओं से गुज़र कर मीठा और पीने योग्य बन कर हमारी प्यास बुझाता है उसी प्रकार पाप से रहित धर्म रूपी जल अमृत-तुल्य बन कर हमारी आत्मा की प्यास बुझाता है। जिनेन्द्र भगवान के अमृत-वचन मन के सभी पापों का प्रक्षालन कर देते हैं। जिन-भक्ति, अति भोगों से अस्वस्थ हुए संसारी जीव के शरीर व आत्मा को अशुभ से शुभ एवं शुभ से शुद्ध परिणामों की ओर ले जाने वाली और मुक्ति प्रदान करने वाली है। ऐसे जिन वचन, जो हमें दिव्य ध्वनि के माध्यम से प्राप्त हुए है वे केवल कंठ या मुख से नहीं बल्कि रोम-रोम से निकलते हैं और हमारे रोम-रोम को प्रभावित करने वाले हैं।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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