योग और ध्यान

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

योग और ध्यान

महानुभावों! आत्मा की चिकित्सा पद्धति का नाम धर्म, योग और ध्यान है। धर्म शब्द सुनते ही हमारे सामने पूजा-पाठ, क्रिया-काण्ड एवं विशेष वेष-भूषा के कुछ साम्प्रदायिक रूप उभरने लगते हैं, पर धर्म शब्द से अभिप्राय क्रिया-काण्ड से नहीं अपितु आत्मा के परम शुद्ध स्वभाव एवं उसके चिंतन से है। मुनि श्री कहते हैं कि आत्मा के स्वभाव को उसका धर्म कहा गया है। आत्मा का स्वभाव है उसका सद्चित् आनंद रूप। अतः वही उसका धर्म है जिसका असत्, अचित् व आकुलता से तिरोभाव हो गया है। स्वभाव वह होता है जो कभी मरता या नष्ट नहीं होता।

विकारों के आवरण को हटाना ही आत्मा की चिकित्सा है। वह चिकित्सा पद्धति है योग-ध्यान। यह पद्धति सम्प्रदायातीत है और आत्मा की चिकित्सा पद्धति के रूप में निर्विवाद रूप में विश्व मंच पर प्रतिष्ठित है। आगे मुनि श्री कहते हैं कि ‘योग’ शब्द युज् धातु से बना है, जिसका अर्थ है - जोड़। जोड़ सदा दो पदार्थों में होता है जिससे बंधन होता है। बंधन से अशुद्धता आती है, उसी से पीड़ा होती है और संसार बढ़ता है; जैसे आत्मा और कर्म का योग या आत्मा और मन-वचन-काय का योग। इसी को आचार्य उमास्वामी ने मोक्ष-शास्त्र में कहा हैः

काय वाङ्गमय कर्म योगः स आश्रवः।

मन, वचन और काय की क्रिया अथवा मन वचनादि कर्म-वर्गणाओं के होने वाले आत्म प्रदेशों के विभिन्न हलन-चलन को योग कहते हैं। अतः अध्यात्म-साधना में यह योग नहीं अपितु इसके लिए अयोग शब्द अधिक उपयुक्त है अर्थात् पदार्थ एवं मन, वचन, काय आदि से जोड़ अथवा योग का अभाव ही मोक्ष है। यही मानव जीवन का परम लक्ष्य है।

जैन साधना योगी होने पर नहीं अपितु अयोगी होने पर पूर्ण होती है। मुनि श्री ने कहा कि योग शब्द का प्रयोग ध्यान और समाधि के अर्थ में किया जाता है। इन्द्रियों आदि के द्वारा विभाजित चिद्वृत्तियों को बाहर से रोक कर अंतरंग में प्रवृत्त करना भी योग है।

बहिरंग व अंतरंग विकल्प को छोड़ कर आत्मा में चित्त करके निरोध करना ही वास्तविक योग है।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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