विजयादशमी
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
विजयादशमी
बन्धुओं! आज का दिन बहुत पावन और पुनीत है। यह दिन उनके लिए एक प्रेरणा ले कर आया है, जो स्वयं को पावन और पुनीत बनाना चाहते हैं। विजयादशमी का अर्थ इसके नाम से ही स्पष्ट है। जिस दिन राम ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त की थी, उस दिन को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है।
दस दिन से राम और रावण के बीच युद्ध चल रहा था। दूसरे शब्दों में कहें तो अच्छाई का बुराई के विरुद्ध और सत्य का असत्य के विरुद्ध युद्ध चल रहा था। इस दिन बुराई के सामने अच्छाई की जीत हुई। बुराई का अन्त तो उस दिन हो चुका था, फिर आज तक बुराई के प्रतीक रावण का पुतला बना कर क्यों जलाते हैं? आपने रावण में ऐसी क्या बुराई देखी जो आज भी समाप्त नहीं हो सकी?
आचार्य रविषेण ने पद्मपुराण में रावण के धन, बल, ज्ञान की बहुत प्रशंसा लिखी है। कहते हैं न कि 100 अवगुणों के बीच एक गुण हो तो वह दिखाई नहीं देता और 100 गुणों के बीच एक अवगुण हो तो वह दिखाई दे जाता है। एक अवगुण 100 गुणों को छिपाने की ताकत रखता है।
रावण के समान जिनेन्द्र-भक्त कोई नहीं था। उसकी लंका में भगवान शान्तिनाथ का विशाल चैत्यालय था, जहाँ वह भक्ति में तल्लीन होकर भगवान की पूजा करता था। एक बार वह वीणा बजा कर भजन कर रहा था तो वीणा का एक तार टूट गया। उसने बिना विलम्ब किए अपनी नस निकाल कर उस तार के स्थान पर लगा दी, पर भजन में कोई व्यवधान नहीं आने दिया। क्या भक्ति की पराकाष्ठा का ऐसा उदाहरण कहीं देखने को मिलता है? क्या आप ऐसी भक्ति कर सकते हो?
आचार्य रविषेण कहते हैं कि जितना ध्यान उसने विद्याएं सिद्ध करने में लगाया, यदि उतना ध्यान मोक्ष-प्राप्ति में लगाता तो उसी भव में मोक्ष प्राप्त कर सकता था। लेकिन उसके एक दुष्कृत्य ने उसे नरक गति में पहुँचा दिया। आज तक किसी माँ ने अपने बच्चे का नाम रावण नहीं रखा। आज भले ही ‘रावण’ नाम के लोग नहीं मिलते पर रावण जैसा काम करने वाले बहुत मिल जाएंगे। रावण ने तो केवल एक बार सीता पर बुरी नज़र डाली थी, पर आजकल तो देखा जाता है कि समाज में ऐसे कितने रावण घूम रहे हैं जिनकी कुदृष्टि से सीताओं की रक्षा करना भी मुश्किल है। शूर्पनखा ने एक लक्ष्मण के सामने प्रणय-याचना की थी तो उसकी नाक कट गई थी और आज कितनी शूर्पनखाएं हैं जो सीधे-सच्चे आदमी पर झूठे आरोप लगाकर पैसे ऐंठ रही हैं और पैसे न देने पर उन्हें जेल की हवा भी खिला रही हैं।
लक्ष्मण से जब सीता के कंगन-कुण्डल पहचानने को कहा गया तो उसने कहा कि मैंने सदा अपनी भाभी की माँ के समान वंदना की है। मैंने उनके चरण ही देखे हैं। मैं उनके नूपुर तो पहचान सकता हूँ, कंगन-कुण्डल नहीं। आज के दूषित वातावरण ने देवर-भाभी, ससुर-बहू आदि के पवित्र सम्बन्धों को तार-तार कर दिया है। आज की कुदृष्टि केवल अपहरण तक ही सीमित नहीं रही, आज के रावण दुष्कर्म के बाद हत्या तक करने में भी संकोच नहीं करते। जलाना है तो अपने भीतर के रावण को जलाओ न!
‘जन-जन रावण, घर-घर लंका; इतने राम कहाँ से लाऊँ?’
'घर-घर पैदा हो रहे कंसा, इतने श्याम कहाँ से लाऊँ?'
आज आवश्यकता है कि हम अपने अन्दर के रावण जैसे क्रूर परिणामों का त्याग करें और अवगुणों पर गुणों की विजय प्राप्त करें, तभी ‘विजयादशमी’ का पर्व मनाना सार्थक हो सकेगा।
इन सब अवगुणों की जड़ है घर-घर में विद्यमान वह कचरे का डिब्बा, जो टी.वी. के नाम से घर के हर कमरे में अपना कब्ज़ा जमाए बैठा है। यदि तुमने उसका सदुपयोग नहीं किया तो तुम कभी भी राम और सीता के गुणों को ग्रहण नहीं कर पाओगे।
हम राम, लक्ष्मण, सीता जैसे महापुरुषों की पूजा-अर्चना तो करते हैं, उनको भगवान तो मानते हैं पर उनकी नहीं मानते। उनके पदचिह्नों पर चल कर, उनके आचरण को जीवन में अपना कर ही उनकी चरण-वंदना को सार्थक किया जा सकता है। हमें शूर्पनखा नहीं, सीता बनना है; रावण नहीं राम के आदर्शों को अपने हृदय में स्थापित करना है।
बन्धुओं! यदि बुराई, बुराई ही बन कर सामने आए तो वह स्पष्ट समझ में आती है. लेकिन जब बुराई, अच्छाई का लबादा ओढ़ कर सामने आती है तो हम पहचान ही नहीं पाते कि यह रावण ही है जो राम का रूप लेकर हमारे सामने खड़ा है।
रावण भी तो साधु का रूप लेकर सीता के सामने आया था और उसे छल करके उठा ले गया था। यदि बुराई अपने असली रूप में हमारे सामने आती है तो उसमें इतनी शक्ति नहीं है कि वह अच्छाई का हरण कर सके।
हिमालय के शिखर पर जाकर कचरा फैलाना सरल है लेकिन अपने जीवन के शिखर पर गुणों की पताका फहराना बहुत कठिन है। पहले अपने जीवन को पताका के समान उन्नत बनाओ। बाहर के रावण को जलाने से पहले अपने अन्दर के रावण को जलाओ। रावण के पुतले को जलाकर तो पंचेन्द्रिय जीव की द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा के साथ-साथ भावी तीर्थंकर की संकल्पी हिंसा का पाप कमा रहे हो, अन्दर की तामसिक प्रवृत्तियाँ तो ज्यों-की-त्यों विद्यमान हैं।
रावण ने एक बार सीता को कुत्सित दृष्टि से देखा तो उसे आज तक अग्नि में दहन किया जा रहा है और आप तो प्रतिदिन न जाने कितनी बार परस्त्री पर बुरी नज़र डालते हो; फिर आपको कौन-से नरक की दाह सहन करनी पड़ेगी, इस बारे में भी तो सोचो, विचारो, मनन करो, चिन्तन करो।
यदि आप अपने विचारों को पवित्र बना लो तो आप भी भावी तीर्थंकर बन सकते हो। परमात्म-पने को प्राप्त करके मोक्ष-सुख का आनन्द ले सकते हो। अतः आज के दिन यह प्रतिज्ञा करो कि रावण को दहन करने वाली अग्नि में हमने अपनी बुराइयों का भी दहन कर दिया है। तभी ‘विजयादशमी’ का संदेश हमारे जीवन को परिवर्तित करने में सहायक होगा।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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