वाणी की मिठास

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

वाणी की मिठास

महानुभावों! क्या आप बता सकते हैं कि संसार में सबसे मीठी वस्तु कौन सी होती है? चीनी, शक्कर, गुड़ या तरह तरह की मिठाइयाँ। शायद आप सोच रहे होंगे कि निश्चित ही मिठाई ही सबसे मीठी होती है। मगर ऐसा नहीं है क्योंकि मिठाई तो केवल रसना इन्द्रिय को तृप्त करने का साधन मात्र है। जब तक मिठाई मुंह में रहती है तभी तक हम उसकी मिठास का आनन्द ले सकते हैं। तो इसके अतिरिक्त संसार में ऐसी कौन सी वस्तु है जो सबसे मीठी भी हो और शाश्वत भी हो। वास्तव में मीठी वाणी ही आगम है और मीठी वाणी ही साधक की सच्ची साधना है। मिष्ट वचनों की मिठास, मिठाई से भी अधिक समय तक तन-मन में मिठास का अहसास कराती रहती है।

मीठे वचन बोलने वाला व्यक्ति हर प्राणी को अपनी ओर आकर्षित करता है। मीठी वाणी में एक आकर्षण होता है जो पराए को भी अपना बनने के लिए विवश कर देता है। मीठे वचन हमारे कानों को अमृत के समान प्रिय लगते हैं। मीठे वचन तप्त हृदय पर औषधि का काम करते हैं। तीर्थंकरों के असंख्य गुणों में हित, मित, प्रिय वचन बोलना एक प्रमुख गुण है। इसका अर्थ केवल यह है कि हित अर्थात् हितकारी बोलो, मित अर्थात् कम बोलो और प्रिय अर्थात् मधुर वचन बोलो। तीर्थंकरों ने भी प्रिय वचन बोल कर हमें यही संदेश दिया है कि सदैव मीठे वचनों का ही प्रयोग करो।

आपने कौए और कोयल को तो देखा ही होगा। देखने में दोनों का रंग एक (काला) है, स्वभाव एक है, आचरण एक है, खानदान एक है पर दोनों की पहचान किससे होती है? उनकी वाणी से। कौआ हमारे आँगन में खुद चल कर आता है, काँव-काँव भी करता है पर हम उसकी बोली को सहन नहीं कर पाते और उसे भगाने के लिए कंकर उठा लेते हैं लेकिन कोयल दूर आम के वृक्ष पर पत्तों में छिपी हुई बैठी रहती है और अपनी मीठी आवाज़ में कुहू-कुहू करती है तो हमारा मन बरबस ही उस ओर खिंचा चला जाता है कि देखें, कोयल कहाँ बैठी है? एक बार उसे देख तो लें।

अब तो आप जान ही गए होंगे कि कौए और कोयल में बाह्य समानताएं होते हुए भी केवल वाणी का ही अंतर है जो एक को कंकर की मार मिलती है और एक को प्यार मिलता है। मीठा बोलने के लिए यह आवश्यक नहीं कि हम मिठाई खाकर ही मीठा बोलेंगे अपितु मीठा बोलने के लिए हमारे मन में मिठास होनी चाहिए, विचार मीठे होने चाहिए क्योंकि जैसे विचार हमारे मन में जन्म लेते हैं वैसे ही हमारी ज़बान से बाहर आते हैं। अतः मन में सदा दूसरों की भलाई का विचार रखें तभी हमारे मुख से मिष्ट वचन निकलेंगे।

कई बार किसी के मन में माया और छल-कपट की भावना होती है। ऐसा व्यक्ति भी आवश्यकता से अधिक मीठा बोलने लगता है मगर उसका उद्देश्य तो कुछ ओर ही होता है। उसके मन में स्वार्थ छिपा होता है। उसकी मीठी बातें शहद में लिपटी तलवार की भांति होती हैं जो मिठास के साथ-साथ काटने का भी काम करती हैं। अतः हमें केवल वाणी से ही नहीं, मन से भी सरल होना होगा, विचारों को भी पवित्र रखना होगा तभी हमारा मीठा बोलना सार्थक होगा। तभी हम सबको अपना बना पाएंगे। इन्हीं भावनाओं के साथ वाणी को विराम देता हूँ।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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