पुण्य

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

पुण्य

आप भगवान के सामने जाकर पूजा-पाठ करते हैं, पुण्य बढ़ाने के लिए और पाप के कर्मबंध का क्षय करने के लिए। यदि आप उसके बदले भौतिक सुख माँगते हो तो वांछित पुण्य प्राप्त नहीं कर पाओगे।

पुण्य मिलता है शुद्ध भाव से की गई आराधना से। एक ग़रीब भी भाव तरंग से पुण्य का उपार्जन कर सकता है।

भगवान ने आपको दो नेत्र दिए हैं प्रतिदिन मंदिर में विराजमान भगवान के दर्शन करने के लिए। दो हाथ दिए हैं भगवान से कुछ मांगने के लिए नहीं, देने के लिए। अपनी शक्ति के अनुसार जितना बन पड़े, अपने द्रव्य का सदुपयोग दान देकर करो। क्या पता कल यह सामग्री, यह धन तुम्हारे पास रहे या न रहे?

आज तुम्हें 10 कमरों की आलीशान कोठी मिली है रहने के लिए। ज़रा सोचो, यह पिछले जन्म में कमाए गए पुण्य के कारण ही मिली है। इस जन्म में किया गया धर्म अगले जन्म तक ही नहीं, जन्म-जन्मांतरों तक तुम्हारे साथ रहेगा।

हर सुबह उठकर सबसे पहले धन के पीछे नहीं धर्म के पीछे भागो। जीविका के पीछे नहीं, जीवन-निर्माण के पीछे भागो। धर्म के पीछे भागोगे तो धन स्वयं ही तुम्हारे पीछे-पीछे दौड़ा चला आएगा। वैसे ही जैसे सूर्य की ओर मुख करके चलने से तुम्हारी परछाईं स्वयं ही तुम्हारे पीछे-पीछे चलने लगती है।

जहाँ पुण्य रहता है, वहीं लक्ष्मी का निवास होता है।

आपने देखा होगा कि फोटो में सरस्वती हमेशा बैठी हुई दिखाई देती है और लक्ष्मी हमेशा खड़ी हुई। इसका अर्थ है कि सरस्वती एक बार किसी के हृदय में विराजमान हो जाए तो वहीं अपना निवास बना लेती है और लक्ष्मी किसी के पास आती है तो छप्पर फाड़ कर भी आ जाती है और जाती है तो पता ही नहीं चलता कि कौन-से रास्ते से घर से बाहर हो गई? पिछले दरवाज़े से गई या टाइल्स उखाड़ कर। पर एक बार चली जाए तो उसके जीवन की पटरियाँ ज़रूर उखड़ जाती हैं।

अतः भक्ति करो, धर्म करो, पूजा-पाठ करो और पुण्य का फल पाओ।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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