पुण्य का फल

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

पुण्य का फल

एक व्यक्ति ने पूछा कि महाराज जी! हम जो पुण्य के काम कर रहे हैं तो क्या एक बार भाव बिगड़ जाने से सारा पुण्य व्यर्थ हो जाएगा?

नहीं! ऐसा नहीं है। मैं आपसे पूछता हूँ कि उस कुएं में पैदा होने वाला मेंढक कौन था?

वह पूर्व भव का सेठ था जो प्रतिदिन नियम लेकर सामायिक करता था। एक दिन उसने एक तेल का दीपक जलाया और नियम लिया कि जब तक यह दीपक जलता रहेगा, मै तब तक सामायिक करने का नियम लेता हूँ। उसके मन में आस्था व समर्पण के साथ-साथ संकल्प भी था। भक्ति तीन प्रकार की होती है - मोम की तरह, लाख़ की तरह और मिट्टी की तरह।

1. मोम का गोला - एक व्यक्ति ने संन्यास लेने की इच्छा की। लोगों ने समझाया कि यह मार्ग इतना आसान नहीं है। तलवार की धार पर चलने के समान है। बाद में निभा नहीं पाए तो व्यर्थ में बदनाम हो जाओगे। 

उसने सोचा कि बात तो सही है। उसका मन पिघल गया और उसने तुरन्त संन्यास लेने की इच्छा पर पूर्ण विराम लगा दिया।

ऐसे व्यक्ति की भक्ति मोम की तरह होती है जो ज़रा-सी आंच मिलते ही पिघल जाती है।

2. लाख का गोला - दूसरे व्यक्ति ने संन्यास लेने की इच्छा की। लोगों ने ध्वनिमत से उसकी सराहना की, पर घरवालों ने समझाया कि यह मार्ग इतना आसान नहीं है। हम तुम्हें इसलिए उपदेश सुनने के लिए नहीं भेजते थे कि घर छोड़कर संन्यासी बन जाओ। पहले अपने परिवार को सम्भालो। 

उस की भक्ति ने भी लाख के गोले के समान कुछ समय बाद तेज ताप से पिघलना शुरू कर दिया और अपनी संन्यास लेने की इच्छा को स्थगित कर दिया।

3. मिट्टी का गोला - तीसरे व्यक्ति ने संन्यास लेने का समाचार अपने घर वालों को दिया। समाज, परिवार व पत्नी के विरोध की अग्नि में वह तपकर और भी अधिक मज़बूत बन गया और अपने संकल्प के बल पर अपना कल्याण करने निकल गया।

वास्तव में कोई संकल्प का धनी हो तो सिद्धियाँ भी उसके चरण चूमती हैं।

इसलिए भक्ति करो तो उस सेठ की तरह जो अपनी सामायिक में अडिग बना रहा। 

उसकी पत्नी भी धार्मिक और पति की सेवा में लीन रहने वाली महिला थी। उसने सोचा कि कहीं दीया बुझने से सेठ की सामायिक न टूट जाए, इसलिए वह दीए में तेल डालती रही। सेठ प्यास से व्याकुल होने लगा। उसका ध्यान माला से हटकर पानी में लग गया और मन में पानी-पानी की रट लगाते हुए मरण को प्राप्त हुआ।

व्यक्ति मरण के समय जो परिणाम रखता है, उसे वैसी ही गति मिलती है। सेठ भी मर कर कुंए में मेंढक बन कर पैदा हुआ। उसने पिछले जन्म में जो साधना की थी, वह व्यर्थ नहीं गई। जब उसने सुना कि भगवान महावीर का समवशरण उस नगर में आया है तो वह भी अपने मुख में फूल की पांखुरी दबाकर चल पड़ा भगवान के दर्शन करने के लिए। रास्ते में राजा श्रेणिक के हाथी के पाँव तले कुचल गया और मरण के समय किए गए शुभ परिणामों के कारण मर कर देवगति में उत्पन्न हुआ। वह राजा श्रेणिक से पहले समवशरण में पहुँच गया था।

ऐसा था भक्ति का फल और उससे पाए हुए पुण्य का प्रताप।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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