पुण्य और पाप

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

पुण्य और पाप

एक स्थान पर दो महिलाएं आपस में बात कर रहीं थीं। एक सखी ने दूसरी सखी से कहा - बहिन! भरत चक्रवर्ती को देखो। वह 6 खण्ड का अधिपति है। देखो न, कैसे इतरा रहा है? घमण्ड में कितना चूर हो गया है! अभी तो हाथी पर बैठा था। हाथी से उतरा तो घोड़े पर बैठ गया, घोड़े से उतरा तो पालकी में सवार हो गया और पालकी से उतरा तो सिंहासन पर विराजमान हो गया। सिंहासन पर विराजमान होते ही सेवक उनकी सेवा में लग गए और उनके चरण दबाने में लग गए हैं।

‘कब के थाके वे हुए, जो अबै दबावें पैर।’

दूसरी सखी स्वाध्याय प्रेमी थी। आजकल लोगों ने स्वाध्याय करना छोड़ दिया है। जबकि स्वाध्याय से केवल ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता अपितु अपनी आत्मा का भी कल्याण होता है। एक महिला आलू और प्याज़ की सब्जी बना रही थी। उसे यह ज्ञात नहीं था कि ज़मीन के अन्दर उगने वाली सब्जी जमींकंद कहलाती है जिसमें अनंतानंत जीव राशि होती है। मुनि श्री ने उस महिला से कहा कि 'आप क्यों यह पाप कर रही हो? क्या आप अगला जन्म रत्नप्रभा में लेना चाहती हो?' उस महिला ने कभी शास्त्र पढ़े होते तो उसे मालूम होता कि नरक की पहली भूमि का नाम रत्नप्रभा है। महिला का उत्तर तो और भी हास्यास्पद था। उसने मुनि श्री को कहा कि 'नहीं महाराज! भला हमारी कहाँ औकात जो हम रत्नप्रभा में जन्म ले सकें? वहाँ तो आप जैसे ही जा सकते हैं।' महिला के दिमाग़ में ‘रत्नप्रभा’ के नाम से ऐसे स्थान की छवि उभरी जो रत्नों से जड़ी हुई पृथ्वी ही होगी। 

दूसरी सखी ने अपनी सखी को उत्तर दिया - बहिन! भरत चक्रवर्ती तो घर में बैरागी के समान रहते हैं। इन्हें कोई अभिमान या घमण्ड नहीं है। यह तो अपने पिछले पुण्यों का फल भोग रहे हैं। पिछले भव में ये एक मुनि थे। दिन में एक बार भोजन करते थे। भूख आदि के परिषह सहन करते थे। वाहन त्याग कर पैदल चलते थे। यह सारा वैभव उसी पुण्य के कारण मिला है जो इस जन्म में इन्हें एक कदम भी भूमि पर नहीं रखना पड़ता।

‘तब के थाके अबे निकाल।’

ये तो अपनी तब की थकावट निकाल रहे हैं।

प्रत्येक जीव अपने किए गए पुण्य व पाप का फल अवश्य भोगता है। पुण्य की पराकाष्ठा परमात्मा बनने में है। इसलिए जहाँ भी पुण्य कमाने का अवसर मिले, उसे चूकना नहीं चाहिए।

पुण्य की सम्पदा हर धर्म-स्थान पर मिलती है।

एक किसान फसल प्राप्त करने के लिए खेती करता है, न कि भूसा पाने के लिए। पर गेहूँ निकालने के बाद भूसा तो स्वयं ही मिल जाता है। 

इसी प्रकार पुण्य प्राप्त करने के लिए ही धर्म किया जाता है। सांसारिक सुख-सुविधाएं तो भूसे के समान स्वयं ही मिल जाती हैं।

अतः पाप से बचो और पुण्य कमाओ।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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