पराधीनता

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

पराधीनता

महानुभावों! पराधीनता का अर्थ है - दूसरे के अधीन हो जाना, दूसरे की दासता स्वीकार कर लेना। आज प्रत्येक मनुष्य या यूँ कहें कि प्रत्येक प्राणी स्वतन्त्र रहना चाहता है चाहे वह तिर्यंच हो या मनुष्य। कोई किसी की गुलामी नहीं करना चाहता। भारतवर्ष में ”स्वतन्त्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है“ का नारा उस समय गूँजा जब भारत अंग्रेज़ों के अधीन था। अपने अधिकार के प्रति जागृति की भावना भर कर ही हमने अपने देश को आज़ाद करा लिया।

यह तो थी देश की आज़ादी की बात मगर मनुष्य अपने बारे में भी तो सोचे कि क्या वह पूरी तरह आज़ाद है? बाह्य रूप से वह किसी का गुलाम नहीं है पर क्या वह इन्द्रियों का गुलाम नहीं है? क्या वह अपने मन के कहने पर नहीं चलता? वास्तव में हमारा ध्यान कभी इस अधीनता की तरफ गया ही नहीं क्योंकि हम सांसारिक बातों में इतने उलझ गए हैं या कह सकते हैं कि हमने स्वयं को भोग विलास में, विषय कषायों में इतना रमा रखा है कि आत्मा की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। 

हमारी आत्मा शाश्वत है, अजर है, अमर है, स्वतन्त्र-स्वरूप है, मगर हमने उसे भोगों व इन्द्रियों के अधीन कर रखा है। यदि हम स्वतन्त्र रहना चाहते हैं तो सबसे पहले इन्द्रियों की दासता से स्वयं को मुक्त करना होगा। इन्द्रियों को अपना दास बनाना होगा तभी हम सच्चे अर्थों में स्वाधीन कहलाएंगे और एक बार जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया, वह जीवन भर के लिए आनन्द को प्राप्त कर लेगा। इसलिए सच्चा सुख तो अपनी आत्मा को जानने में ही है।

बहिरात्मा होना पराधीनता का सूचक है। जब हम भोग-विलास, विषय-कषाय के अधीन होते हैं तो उसे बहिरात्मा कहा जाता है अर्थात् बाहर की आत्मा। अन्तरात्मा का अर्थ है - विषय कषायों से रहित होकर अपनी आत्मा के शुद्ध, चैतन्य स्वभाव को जानकर उसमें रच बस जाना। बाहरी आडम्बरों को छोड़ कर अपनी आत्मा में रमण करना ही अन्तरात्मा है और परमात्मा अर्थात् परम आत्मा बनना ही हमारा लक्ष्य है, वही हमारी मंजिल है।

“बहिरात्मा को छोड़ कर अन्तरात्मा में रमण करें तो हम अवश्य ही एक दिन परमात्मा बन जाएंगे।”

अतः हे प्यारे बन्धुओं! हमें पराधीनता को छोड़ कर स्वतन्त्र बनना है, इन्द्रियों को वश में करना है। यही एक साधक की सच्ची साधना है, यही मोक्ष मार्ग की प्रथम सीढ़ी है। जिसने इन्द्रियों की दासता स्वीकार नहीं की अपितु उनको ही अपने अधीन कर लिया, वही सच्चे अर्थों में अपनी आत्मा का उपासक है, वही परमात्मा बनने योग्य है। इन्हीं पुनीत भावनाओं के साथ गुरुवर के चरणों में - नमोस्तु! नमोस्तु! नमोस्तु!


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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