कवि की दानशीलता
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
कवि की दानशीलता
एक समय की बात है, एक कवि राजा भोज के दरबार में कविता सुनाने जा रहा था। रास्ते में उसे एक ऐसा भिक्षुक मिला जो नंगे पैर था। गर्मी का मौसम होने के कारण वह अपने पैरों को धरती पर रख भी नहीं पा रहा था। कवि का हृदय दया से भर गया। उससे भिखारी का कष्ट देखा नहीं गया और उसने अपने दोनों जूते उतार कर उस भिखारी को दे दिए। कवि स्वयं नंगे पैर तपती ज़मीन पर चलने लगा।
तभी राजा भोज के प्रधानमंत्री की सवारी हाथी पर निकल रही थी। उसने कवि को नंगे पैर चलते हुए देखा और महावत को हाथी रोकने का आदेश दिया। प्रधानमंत्री से भी कवि का तपती ज़मीन पर नंगे पैर चलना देखा नहीं गया और प्रधानमंत्री ने कवि को हाथी पर बैठा लिया और वे बातें करते हुए आगे बढ़ने लगे।
जब उनकी सवारी राजमहल के पास पहुँची तो राजा ने कवि से पूछा कि यह हाथी आपको कहाँ से मिला? यह तो बहुत सुंदर है। कवि ने उत्तर दिया कि महाराज! केवल एक जोड़ी जूतों के दान से इस गजराज की प्राप्ति हुई है।
वह कैसे?
तो कवि ने भिखारी को जूते देने की सारी घटना कह सुनाई। राजा भोज यह सुनकर अपनी प्रजा की दानशीलता से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने 1000 स्वर्ण मुद्राओं के साथ वह हाथी भी कवि को पुरस्कार स्वरूप दे दिया।
तो यह था कवि द्वारा की गई छोटी-सी उदारता का बड़ा फल।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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