कर्त्ता सो भोक्ता
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
कर्त्ता सो भोक्ता
व्यक्ति कर्म करते समय नहीं सोचता कि वह पाप कर रहा है या पुण्य-कर्म। कर्म करते समय तो वह हंसते-हंसते करता है और जब उसका परिणाम भोगने का समय आता है तो रो-रो कर भोगता है। भगवान महावीर कहते हैं कि ऐसे कर्म मत करो जिनका फल भोगने में रोना आए और कहीं बुरे कर्म का फल भोगने में कष्ट भी होता हो तो उसे समता भाव से सहन करो ताकि वह कर्म कट जाए न कि और भी कर्मों को बांध कर जाए।
कर्मों का बंध तीन प्रकार से होता है - मन से, वचन से और काया से।
मनुष्य शरीर से कार्य नहीं करेगा, तो मन और वचन से करेगा। वचन से भी नहीं करेगा तो मन से तो निरन्तर कुछ-न-कुछ सोचता ही रहता है। मन से किसी के प्रति बुरा सोचता है तो पाप कर्म का बन्ध होता है।
संसार की अदालत में तो केवल काया से अपराध करने और सिद्ध हो जाने पर ही सज़ा का प्रावधान है, पर कर्म की अदालत में मन से बुरा सोचने पर भी मनुष्य, सज़ा पाने का पात्र बन जाता है। यद्यपि न तो उसने वचन से किसी को भला-बुरा कहा और न ही किसी को काया से कष्ट पहुँचाया, फिर भी वह दण्ड का पात्र बन गया। अब उसे मन से सोचे गए पाप की सज़ा तो भोगनी ही पड़ेगी।
गांधी जी के तीन बंदर कहते हैं - बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो।
भगवान महावीर कहते हैं कि बंदर तीन नहीं चार होने चाहिएं। चौथा बंदर कहता है कि बुरा मत सोचो। आपके सोचने से किसी का अहित होने वाला नहीं है लेकिन अहित होगा तो केवल आपका, आपके भावों का, आपके परिणामों का; जो कालान्तर में आपके सुख-दुःख का कारण बनेंगे।
जैसे यदि हम अपने हाथ में जलता हुआ अंगारा उठाएंगे तो पहले अपना ही हाथ जलेगा और अपने हाथ में ठंडा कोयला भी उठाएंगे तो पहले अपना ही हाथ काला होगा, भले ही हम उसका प्रयोग दूसरे पर करें या न करें।
जब व्यक्ति दूसरे की ओर अपनी एक अंगुली उठाता है तो उसकी तीन अंगुलियां उसके स्वयं की ओर इंगित करती हुई दिखाई देती हैं और अंगूठा ऊपर की ओर, जो इशारा करता है कि दूसरे पर अंगुली उठाने से पहले ऊपर वाले से डरो। वह भी तुम्हें देख रहा है। दूसरे को एक गुणा फल मिलेगा तो उसका तीन गुणा फल तुम्हें मिलने वाला है।
केवल पाप का ही नहीं, पुण्य का फल भी तीन गुणा होकर तुम्हारे सामने आएगा।
अतः अपने मन, वचन व काया तीनों को पवित्र बनाओ क्योंकि जो कर्त्ता है वही भोक्ता है।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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