जो वन गया वह बन गया

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

जो वन गया वह बन गया

यावन्ति जिनचैत्यानि विपन्ते भुवनत्रये।

तावन्ति सततं भक्त्या त्रि परीत्य नमाम्यहम्।

राम को मनाने के लिए भरत चला वन की ओर। मार्ग में गंगा पड़ी। भरत ने उसमें स्नान किया। आगे चले तो रास्ते में यमुना पड़ी। भरत ने उसमें भी साथियों सहित स्नान किया और आगे चल पड़े। कुछ आगे चलने के बाद रास्ते में सरस्वती नदी पड़ी। उसमें सभी साथियों ने तो स्नान किया पर भरत ने नहीं किया। 

लोगों ने पूछा - महाराज! आपने गंगा में स्नान किया, यमुना में किया पर सरस्वती में, जो त्रिवेणी का संगम है, इसमें स्नान क्यों नहीं किया? भरत ने कहा कि मैं इसमें स्नान नहीं करूँगा। लोगों ने पूछा - आखिर क्यों, महाराज? भरत ने कहा कि ठीक है। सुनना ही चाहते हो तो सुनो। इसने मेरी माँ को ऐसी कुबुद्धि दी है जिसके कारण मेरे भाई को बनवास मिला, उन्हें 14 वर्ष के लिए वन में जाना पड़ा।

यह था भरत का आदर्श। उनका अपने भाई के प्रति कितना गहन प्रेम था! भगवान महावीर कहते हैं कि हमारे मन में ऐसा ही प्रेम प्राणी मात्र के लिए होना चाहिए। किसी के प्रति दुर्भावना रखना, किसी का अशुभ चिंतन करना या अहित विचारना वस्तुतः स्वयं का ही अहित करना है क्योंकि कौए के कोसने से ढोर नहीं मरता। पड़ोसी का अहित सोचने से पड़ोसी का कुछ नहीं बिगड़ता पर तुम्हारा बिगाड़ होना तो अवश्यम्भावी है।

यदि हम यह सोचें कि सारी दुनिया का कल्याण हो, ‘सुखी रहें सब जीव जगत के’ तो कौन सा इसमें Sales Tax लगता है? कुछ भी तो नहीं लगता, फिर शुभ भाव तुम्हारे दिमाग़ में क्यों नहीं आते? याद रखना, शुभ विचारों से ही जीवन में शुभता आएगी।

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की चर्चा करते हुए कहा जाता है कि वन का जीवन से गहरा सम्बन्ध होता है। ‘जीवन’ शब्द में वन है। इसका तात्पर्य यह है कि वास्तविक जीवन के दर्शन तो वन में ही हो सकते हैं। वन ‘बनने’ की प्रयोगशाला है। राम वन में गए तो ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बन गए, वर्द्धमान वन में गए तो ‘महावीर’ बन गए, बुद्ध वन में गए तो ‘तथागत’ बन गए। जो वन में गया वह बन गया। वन में ही बना जा सकता है। भारतीय मनीषी इसी बात के पक्षधर रहे हैं। जिसने भी कुछ पाया है वह वन में ही पाया है। महल तो ‘मरघट’ है। महलों में तो प्राण हर पल घटते ही हैं। भवन में तो मिटना होता है। कंस महल में रहा तो मिट गया। क्यों? क्योंकि वह भवन की विलासिता में झुलस गया था।

मुनिश्री ने उपस्थित जन समुदाय को पुरजोर शब्दों में कहा कि जीवन में भवन को महत्त्व नहीं देना क्योंकि जीवन वन में होता है, जीवन के प्राण वन में ही होते हैं। भवन से तात्पर्य केवल सुविधा बढ़ाने से है। जीवन में सुविधा नहीं, साधना और संयम होना चाहिए, शुभ भावना होनी चाहिए। सुविधाभोगी मत बनो, जीवन में साधना अवश्य होनी चाहिए। आज तो तुम्हारे पास सब सुविधाएं हैं, कल यदि कुछ नहीं होगा तो तुम बिना साधना के क्या करोगे? अपने मन को कैसे  सम्हालोगे? यदि साधना होगी तो ही सम्हाल पाओगे स्वयं को। जीओ लेकिन मृत्यु को भुलाकर नहीं, बुलाकर जीओ। अंत में एक मुक्तक सुना कर विराम लेंगे -

देख दुःखों की कृपा घटाएं, क्यों इतना घबराता है।

अविरल अश्रु बहाने से क्या, यह संकट टल जाता है।

धैर्य धर, तू मत घबरा,

हिम्मत रख और आगे बढ़ जा।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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