दुःख - सुख

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

दुःख - सुख

जानता हूँ बाग़ में दो दिन रहेंगे फ़ूल,

जब तक उन्हें हवा मिलती रहेगी अनुकूल।

सोने तक ही आँखों में रहेंगे सपने,

जागने पर सामने पड़ी मिलेगी धूल।

दुःख से मुक्ति कैसे मिले - आज हम दुःख-सुख के बारे में जानने का प्रयत्न करते हैं कि हमें दुःख का अनुभव कैसे और क्यों होता है और सुख का कैसे होता है।

अभाव में जीवन को व्यतीत करने से दुःख का अनुभव होता है और सद्भाव में जीवन को व्यतीत करने से सुख का अनुभव होता है।

अभाव क्या होता है - जो हमारे पास है उसे न देखकर, जो हमारे पास नहीं है उसके बारे में चिंता करना ही अभाव का लक्षण है जिसके कारण हमें दुःख का वेदन होता है। जो हमें प्राप्त है, उसकी ओर से आँखें बंद की हुई हैं और जो अप्राप्त है, उसकी ओर हम भाग रहे हैं तो हमारे मन में दुःख ही होगा। हम सुख का अनुभव कैसे कर सकते हैं?

हम जिस वस्तु के स्वामी हैं उसे भूलकर पड़ोसी की वस्तु पर नज़र गड़ाए हुए हैं। लेकिन वह हमें मिल नहीं सकती क्योंकि उसका मालिक वह पड़ोसी है, हम नहीं। सदा दूसरे की वस्तु को पकड़ना, झपटना, उसे अपना बनाने के लिए सतत प्रयासरत रहना ही दुःख का कारण है।

अतीत की स्मृति में और भविष्य की कल्पना में खोए रहना ही दुःख को जन्म देता है।

इसके विपरीत जो वस्तु हमें प्राप्त है, उस का आनन्द लेना सुख है। जो हमारे भाग्य से मिला है, उस में संतोष रखना, भोजन, वस्त्र, मकान आदि में संतुष्ट रहना सुख का वेदन कराता है। जो वर्तमान में जीवन जीए, वही सुखी कहलाता है।

तुम भविष्य की काल्पनिक दुनिया में विचरण करते रहते हो और दुःखी होते रहते हो। उस काल्पनिक दुनिया को बसाने के लिए तुम दिन-रात लगे रहते हो, अपना खून-पसीना बहाते रहते हो। तुम्हारी रात की नींद उड़ जाती है, दिन का चैन खो जाता है और जब तुम्हें अपनी अभीष्ट वस्तु प्राप्त नहीं होती तो तुम निराश, हताश, उदास हो जाते हो, दुखित हो जाते हो। 

तुम्हारे दुःख का मूल कारण तुम्हारी आकांक्षा, इच्छा, वासना और कल्पना ही है। 

जब मैं लोगों के चेहरे देखता हूँ तो उनकी आँखों में मासूमियत नज़र आती है और जब मैं उनके अंतरंग में झांक कर देखता हूँ तो दुःख के सागर को उमड़ते हुए देखता हूँ। वहाँ एक बेचैनी, कड़वाहट और तीखेपन का आभास होता है। हर व्यक्ति के दुःखी मन की अपनी व्यथा-कथा है जिसे वह सुनाने को आतुर रहता है। ऐसा क्यों होता है? आपने कभी सोचा है? ऐसा इसलिए होता है कि सभी निन्यानवे के फेर में पड़े हुए हैं। यहाँ तक कि मान, आदर, प्रेम, वात्सल्य भी पाना सब चाहते हैं, देना कोई नहीं चाहता। इसीलिए सब दुःखी बने रहते हैं।

इसी प्रकार दिन ढलता है, रात होती है और अगले दिन फिर वही कशमकश, वही गधा-मजूरी अर्थात् गधे के समान बोझा ढोने की मज़दूरी और मज़बूरी शुरू हो जाती है। फिर कोल्हू के बैल की तरह आँखों पर पट्टी बांध कर चल पड़ते हैं संसार का पहिया घुमाने। वही दौड़-धूप, वही भागमभाग, वही उठापटक, वही रात की नींद और दिन का चैन समाप्त होने लगता है। फिर वही कमरतोड़ मशक्कत शुरू हो जाती है। क्यों? क्योंकि निन्यानवे से सौ बनाने हैं, सौ से हज़ार बनाने हैं। हर प्रकार के काम में आने-वाले और फिज़ूल के अटरम-सटरम खटकर्म शुरू हो जाते हैं। भविष्य में हमारे जीवन की नाव फिर उथल-पुथल होकर हिचकोले खाने लग जाती है।

एक आदमी रोज़ भगवान के मंदिर में जाता और प्रार्थना करता कि ‘हे भगवान्! मैं बहुत दुःखी हूँ। मुझे दुःखों से मुक्ति दिला दे, मुझे मोक्ष चाहिए, मुझे मोक्ष दिला दे।’ लेकिन असलियत तो भगवान भी जानते हैं। यदि तुम दुःखों से मुक्ति का जो रास्ता वे बताते हैं, उस पर चलना नहीं चाहते तो मोक्ष पाने की इच्छा का ढोंग क्यों करते हो?

भगवंतों और संतों से कुछ मांगने न आ जाना। खासकर मुझसे तो बिल्कुल भी नहीं। मेरी बुद्धि ज़रा उलटी किस्म की है। कोई कहता है कि मुझे धन दे दो, मुझे स्वास्थ्य दे दो, मेरे शरीर में दर्द रहता है, मेरे सिर का दर्द ठीक कर दो.........। क्या मैं तुम्हें कोई शरीर का डाक्टर नज़र आता हूँ या लक्ष्मी के भंडार भरे रहता हूँ कि उठाई मुट्ठी में और दे दी? क्या मैं किसी सोने-चांदी की खदान का मालिक हूँ?

भाई! मैं तो संत हूँ। आत्मा का उपचार कर सकता हूँ और शरीर को जन्म-मरण के रोग से छुटकारा पाने का उपाय बता सकता हूँ। अग़र त्याग, तपस्या की बूटी चाहिए तो मेरी दुकान पर हर समय Free में Sale की जाती है, सेवन करना तुम्हारा काम है।

जब जी चाहे आओ और दुःखों से मुक्ति पाओ।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

Comments

Popular posts from this blog

स्वतंत्रता दिवस

जीवन में गति है पर दिशा नहीं

प्रभु को प्राप्त करना है