धर्म की दृढ़ता
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
धर्म की दृढ़ता
दृढ़ता से पलता धर्म, कहते ज्ञानी लोग।
वज्र करण से अटल रह, साधे तीनों योग।।
राजा वज्रकरण ने एक वज्र प्रतिज्ञा की कि मैं सच्चे देव, शास्त्र, गुरु को छोड़ कर अन्य किसी को भी नमस्कार नहीं करूँगा उसने इसका भी उपाय खोज लिया। उसने अपनी अंगूठी में भगवान मुनिसुव्रतनाथ का छोटा सा चित्र जड़वा लिया। जब भी उसे महाराजा सिंहोदर के दरबार में उन्हें नमस्कार करने का मौका आता तो वह अपनी अंगूठी में भगवान मुनिसुव्रतनाथ के चित्र के दर्शन करता और सिर झुका कर प्रणाम करता।
महाराजा सिंहोदर को उसकी चाल का पता चल गया। अतः उसने वज्रकरण का राज्य छीनकर उसके नगर को उजाड़ दिया। अपनी विपत्ति के बाद भी वज्रकरण ने राज्यविहीन रहना स्वीकार किया पर सच्चे देव, शास्त्र, गुरु को छोड़ कर अन्य किसी को भी नमस्कार नहीं करने की प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी।
राम को अपने बनवास के समय जब इस अन्याय का पता चला तो उन्होंने महाराजा सिंहोदर के राज्य पर विजय प्राप्त करके उसे बंदी बनाया और वज्रकरण का राज्य उसे वापिस दिलवाया।
तो यह था धर्म पर दृढ़ रहने का सुपरिणाम।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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